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शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2018

किस से करें..?

इश्क़ की गुहार, किस से करें
कहो तो प्यार, किस से करें..?

वो किस्से कहानियों में बीती रातें
मान लिया खुद को किसी का प्यार
अब ये इज़हार
किस से करें..?

मैं हर वक़्त तेरी दहलीज़ पे
बैठा ये सोचता हूँ
के अब दीदार की दरकार
किस से करें..?

वो सूनी सीढ़ियों पर
सूखते दरख़्तों की कंपन
हवाओं में बिखरा है प्यार
किस से करें..?

इश्क़ मुकम्मल नहीं
ज़िन्दगी बेवफ़ा नहीं
जो तू रूठ गया अब की बार
तो बोल न माही!
ये इज़हार - ओ - इक़रार
किस से करें..?

महेश "माही"
15/2/18

सोमवार, 1 मई 2017

पहले तो ऐसा न था कभी..

पहले तो ऐसा न था
के तुझे देखने की तड़प
तुझे सुनने का एहसास
तुझे छूने की चाह
और तेरा होने की प्यास..
कहाँ था ऐसा कुछ भी
जो भी था
वो
वो जैसे कुछ धुंधला धुंधला सा
याद आता है
पर
जो अब है
वो पहले तो न था
हम
मिलते नहीं थे
अब
साथ रहते हैं
एक दूजे के दिल में
जैसे
अनजान थे पहले
पर अब
बहुत कुछ जान गए हैं
फिर भी जाने क्यों
दिल ये मेरा
तेरे लिए अनजान ही बना रहना चाहता है
ताकि
तुझे और जान सकूँ
पर..
पहले तो ऐसा न था
जो अब है।
ये रिश्ता
एक नए मोड़ पर है
क्या तुझे एहसास है
या
ये बस मेरी प्यास है??
जो भी है
एक धीमी तड़प है
फिर भी सुखद है
जैसे
गुलाब के फूल संग काँटे।
दिल करता है
कभी कभी
तुझे मोबाइल फोन पे ही
अपनी छुअन का एहसास दिलाऊँ
और उसी एहसास में
मैं भी
गुम हो जाऊं
कहीं
खो जाऊँ।
बस
तेरा हो जाऊं..
क्या तुमने सोचा कभी
माही!
पहले तो ऐसा न था कभी..
है न??

महेश_माही
1 मई 2017
10:29 pm

शुक्रवार, 13 नवंबर 2015

जाने क्यों..?

जब मैं तुमसे मिली थी
तब कुछ खास नहीं लगे तुम
पर शायद
कोई तो बात थी तुममे
जिस कारण
मैने तुमसे
दोस्ती करना चाही।
हममे
धीरे धीरे
बात
बातों की शुरुआत हुई।
फिर इन्हीं
बातों बातों में
मैं तुम्हे जानने लगी।
तुम इतना सच बोलते थे
कि अक्सर डर लगता था मुझे
कि अगर
हमारा रिश्ता आगे बढ़ता है तो
हम कैसे एक रह पाएंगे
बस इसी डर से
मैंने तुमको ठुकरा दिया था।
पर
जाने तुझमे क्या बात थी
जो तुम मुझे
अपने पास
वापस ले आये।
मैं फिर आई
तुम्हारी ज़िन्दगी में।
बस तुमको सुनने के लिये
मैं तुमसे बात करने लगी
बस तुमको देखने के लिए
तुम्हारी फोटो तुमसे मांगने लगी।
सब जानती थी मैं
तुम्हारे बारे में
कि तुम इश्क़ के काबिल नहीं
फिर भी
अब मैं तुमसे प्यार
करने लगी।
पर रहना था मुझे
प्यार से दूर
बस इसीलिए मैं
इन्कार करने लगी।
और फिर वही हुआ
जब तुमने सच में
इन धड़कनों को छुआ।
पर तुमने धोखा दिया
मुझे अपना के मुझसे दगा किया।
और चले गए दूर मुझसे
जाने क्यों हुए इतने मजबूर खुद से।
मैंने भी तब
तुमसे दूर जाने का
फैसला किया
पर दिल है कि मानता नहीं
ये आज भी
तुझे सुनने की ज़िद करता है
चोरी छुपे हर रोज
ये बस तुझको ही पढ़ता है।
सोचती हूँ
कि अब तो तुम बहुत दूर हो माही!
पर फिर भी
ये दिल मेरा
बस तुम्हारे लिए ही आज भी
जाने क्यों धड़कता है।
पता नहीं..
आखिर क्यों??

#महेश_बारमाटे_माही

रविवार, 16 अगस्त 2015

वो प्यार नहीं था..

वो...

वो प्यार नहीं था,
के जब तुमसे दूर जाने की बात
मैंने तुमसे कही थी
तो तुमने मुझे
न जाने कितनी बददुआएं,
कितनी बुरी बातें
कितने बुरे विचार
बस मेरे लिए ही तुम्हारे लबों से
कही होगी।

उन लबों से
हाँ! उन्हीं लबों से
जिसकी कभी मैंने अपनी किसी कविता में
या किसी शायरी में
सुर्खी की तारीफ़ें
कही होगी।
 
तुमने उस रात
मुझे सुनना ही नहीं चाहा
और न ही उसके बाद कभी,
क्या पता
दिल ने तुम्हारे
शायद मेरी कोई बात
तुमसे कही होगी।
वो प्यार नहीं था
के फैसला मेरा था
तुमसे दूर जाने का
के शायद
मेरे प्यार में थी कुछ कमी
जो तुमको अपनी
मजबूरी का पता चलने न दिया।
तुमसे बिछड़ के
तुम्हारी बददुआओं के साथ
जी लिया
और आज भी
जी रहा हूँ
“तुम कभी खुश नहीं रहोगे”
ये बात तुमने दिल से
कही होगी।  

तभी तो
आज मैं बस जी रहा हूँ
और खुश हूँ अपने सच्चे दिलबर के साथ
पर कहीं न कहीं
तुम्हारे दिल की बात
ऊपर वाले ने शायद
सुनी होगी
और
मैं और मेरा दिलबर
तुम्हारी बददुआओं के घेरे में
खुशी खुशी
ग़मों से लड़ रहे हैं
फिर भी
कभी मैंने तुमको
कोई बददुआ नहीं दी
के दिल में मेरे
कहीं प्यार नहीं था
पर प्यार में मुझे
बस दुआ ही देना आता है
पर शायद
वो प्यार नहीं था
जो तुमने मुझसे किया था।
तभी तो...

- महेश बारमाटे "माही"
16 अगस्त 2015

सोमवार, 15 दिसंबर 2014

तेरे रंग में रंग दे...



मुझपे रंग अपना, कुछ ऐसा लगा माही!
के अब कोई दूजा रंग मुझपे दिखे नहीं।

उतर जाएँ सारे रंग पुराने
के अब कोई दूजा रंग मुझपे बचे नहीं।

ऐसे सजूं कुछ अब मैं तेरे रंग से
के अब कोई दूजा रंग मुझपे सजे नहीं।

जहाँ भी जाऊं बस तुझको ही मांगू
के चाहत अब कोई मुझ में बचे नहीं।

कर दे रंगीन ये दुनिया मेरी
के हाथों पे कोई दूजी महंदी रचे नहीं।

आजा तेरे रंग में रंग जाऊं अब मैं कुछ ऐसे
के दुनिया का कोई रंग मुझपे अब बचे नहीं।

- महेश बारमाटे "माही"

रविवार, 5 अक्टूबर 2014

आज जरा जी लेने दे मुझे...


आ भर लूँ बांहों में तुझे
कि आज जी लेने दे मुझे।

ये तरसती निगाहें
और खुली मेरी बाहें
तू इन धड़कनों की प्यास है
क्या कहती हैं धड़कने तेरी
आज सुनने दे मुझे।

मेरी प्यास है तू
एक अन्जाना एहसास है तू
लिखा है नाम मेरा
हाथों की लकीरों में तेरी
एक बार फिर पढ़ने दे मुझे।

ये लबों की सुर्खी मेरी
बस तेरे नाम से है माही!
है इश्क़ तुझसे
कि आज लबों को लबों से
छू लेने दे मुझे।

आज जरा जी लेने दे मुझे...।

-महेश बारमाटे "माही"

बुधवार, 13 अगस्त 2014

तुम थे वहाँ...

तुम थे वहाँ
करते मेरा इंतज़ार
बैठ बिस्तर के कोने में
था मेरे आने का एतबार।

जाने कितनी देर
बैठे थे तुम वहाँ
मैंने की देर
गर्म मौसम में जैसे सर्द हवा।

हाँ! गलती थी मेरी
कि मैं न आया
किया इंतज़ार तुमने
और मैं पछताया।

पर क्या करता मैं
तुम जो हो खफा मुझसे
करनी नहीं है बात तुम्हे
और चाहते हो वफ़ा मुझसे।

तेरे होने का एहसास मुझे
तेरे और करीब ले आता है
तेरी मौजूदगी बताती है
कि ये एहसास तुझे
कितना तड़पाता है।

न तड़प
आ बाँहों में भर मुझे
एक पल को हो के मेरा
एक नगीना सा
दिल के ताज पे जड़ मुझे।

आ मेरा हो जा
मुझमे आज तू खो जा
ख्वाबों में सोया है अक्सर
आ खो के मुझमे तू सो जा।

कर ख़त्म इंतजार को अब
बरसा मुझपे अपने प्यार को अब
बिता दे सारी ज़िन्दगानी अपनी माही!
इस पल में पूरा कर अपने एतबार को अब।

महेश बारमाटे "माही"

रविवार, 10 अगस्त 2014

पराया..

क्या चाहूँ
और क्या हो जाता है,
जिसे चाहूँ
वो पराया हो जाता है।

इश्क़ की आबो-हवा
मेरी महफ़िल में न थी कभी
जीता रहता हूँ ग़लतफ़हमी में अक्सर
करीब जाऊं तो दिलबर मेरा
बस एक साया हो जाता है।

समझ भी न पाया कभी
और जान भी न पाया कभी
ये इश्क़ है या और कुछ
इक पल में ही किया धरा
सब जाया हो जाता है।

या रब!
बहुत देखी तेरी खुदाई
मिला के क्यूँ दी ये जुदाई
कोई अब तक न अपना सका इस दिल को माही!
और हमेशा ये दिल ही क्यूँ पराया हो जाता है।

- महेश बारमाटे "माही"

गुरुवार, 26 जून 2014

कहानी तेरे नाम की...

लिखी थी कहानी तेरे नाम की
मुझमे थी ज़िंदगानी तेरे नाम की

हवा में ठंडक, फिजा में रंगत
और चुनरी थी धानी तेरे नाम की

गुलों में गुलाब, मयखाने में शराब
साकी भी थी दीवानी तेरे नाम की

पुकारता चला था मैं, हर गली, हर शहर
लबों पे थी कहानी तेरे नाम की

एक कहानी, तू पगली दीवानी
मेरी भी एक थी रानी तेरे नाम की

सूखी स्याही, पन्नों पे फैला अश्कों का पानी
खो गई मुझसे, ये ज़िंदगानी तेरे नाम की

अब जो जी रहा हूँ
तेरे इंतज़ार में माही!
आ पूरी करें
फिर ये कहानी तेरे नाम की

लिखी थी जो
कहानी तेरे नाम की
तुझ बिन अधूरी है
मेरी ज़िंदगानी तेरे नाम की...

- महेश बारमाटे “माही”

(Photo Courtesy : images.google.com)

बुधवार, 4 जून 2014

यकीन...

तू ज़िंदगी भर बस मुझे ही चाहेगा माही!
ये यकीन, तू ने मुझे हर ख़्वाब में दिलाया है।

जाने कितनी कवितायें, 
ग़ज़ल, 
शेरों-शायरियाँ
लिखने के बाद ही 
मैंने तुझे पाया है।

दूरियाँ, 
रिश्तों पे कभी भारी पड़ भी गई तो क्या ?
तू तो बस मेरा,
हाँ!
बस मेरा सरमाया है।

रब जाने के क्या हकीकत होगी,
तेरी – मेरी कहानी की ?
मैं रहूँ, न रहूँ, पर तेरे दिल में रहूँगा सदा,
ये यकीन, तू ने ही मुझे दिलाया है।

किसी अधूरी कहानी से
ये अल्फ़ाज़ मेरे
ये कहानी करेंगे बयां,
के तू ने ही जीता है माही!
और तू ने ही मुझे हराया है।

- महेश बारमाटे “माही”

सोमवार, 5 मई 2014

मैं...

तेरे इश्क़ की
आवाजें सुनता मैं। 
अब हर पल
तेरी धड़कनों से
बातें करता मैं ।

कभी इस जहां, कभी उस जहां
कभी दरिया तो कभी सहरा
बस तुझे ही ढूँढता फिरता मैं।

जी रहा हूँ इस कदर
दर-ब-दर, दर-ब-दर
हर गली हर शहर
तेरे ही नगमें गाता मैं।

ज़िंदगी एक ख्वाब हो
या सफर...
जुदा हो के भी
बस तुझमे समाता मैं।

तेरी कहानी
का हर लफ्ज
मेरी आँखों से पढ़ ले
के हर किस्से में
खुद में ही खोता जाता मैं।

आज मुझमे और तुझमे
क्या फर्क है बचा माही!
कभी तू मुझमे
कभी तुझमे समाता मैं।


- महेश बारमाटे "माही"

शुक्रवार, 2 मई 2014

मजबूरियाँ

कुछ वर्ष पहले, जब मैंने लिखना शुरू किया था, बस उनही दिनों की यादों को याद करता मैं, आज अपनी डायरी पढ़ रहा था, तो एक अनमोल नगीना मिला। सोचा कि कुछ छोटे - छोटे फेर बदल के बाद आपके साथ साझा कर लूँ। 


मिल के भी मिल न सके हम
जाने वो क्या मजबूरी थी?
फासले तब हो चुके थे सारे कम,
पर जाने कैसी दूरी थी?

तेरी एक चहक से
महक उठा था मेरा सारा आलम
तब जिसने भी देखा
तुझे देना चाहता था अपना मन
तुझमे जाने कैसी जादूगरी थी?

सोचा था,
इज़हार करूंगा मैं तुझसे
जब हल्की सी धूप खिली थी।
सारा जहां महक रहा था उस पल,
फिजा में बस तेरी महक घुली थी।

हमारे इश्क़ को शायद
लग गई थी किसी की नज़र
जिससे हम थे जाने क्यों बेखबर?
समय पर मैं आ न सका
और तुझे पा न सका,
मेरी भी जाने ये कैसी मजबूरी थी?

मेरी आँखों के सामने
तू किसी और की हो गई
ऐसा लगा जैसे मेरी किस्मत
एक बार फिर सो गई,
पर बिन तेरे ये ज़िंदगी
अब भी अधूरी थी।

फिर भी आज बिन तेरे जी रहा हूँ मैं
ग़म – ए- जुदाई घुट – घुट के पी रहा हूँ मैं।
हमारे दरमियाँ पहले कभी न इतनी दूरी थी...

बहार में भी हमारे प्यार का गुल खिल न सका
उसकी भी कोई न कोई तो मजबूरी थी।
हम मिल के भी मिल न सके
तेरे – मेरी माही!
जाने क्या मजबूरी थी...?

- महेश बारमाटे "माही"

बुधवार, 30 अप्रैल 2014

वो मुझसे प्यार करने लगे हैं...

वो मेरा इंतज़ार करने लगे हैं
कुछ – कुछ मुझसे इक़रार करने लगे हैं
यूं तो कभी न हुई कोई मुलाक़ात हमारी
पर अब वो ख्वाबों में मेरा दीदार करने लगे हैं।

बस जानते हैं
एक – दूजे को हम,
पर पूरी तरह से नहीं।
फिर भी मेरी अनजान शख्सियत पे
वो अब एतबार करने लगे हैं

मेरी पसंद – न – पसंद तो
रब जानता है मेरा।
पर अपनी पसंद का वो अब
सरे – आम इज़हार करने लगे हैं।

हर पल बदलती अदा ये उनकी
मेरी सोच मे दस्तक देती है
के अब क्या कहूँ इसे मैं माही!
क्या वो मुझसे प्यार...
करने लगे हैं ???

- महेश बारमाटे "माही"

गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

मेरे माही!


इश्क़ करता है तू
मुझसे मेरे माही!
पर जाने डरता है तू
किस से मेरे माही!

ये चाहत भी अजीब होती है।
हर पल मैं – तेरे और तू – मेरे करीब होती है।
फिर भी जुदा – जुदा सा फिरता है तू
मुझसे मेरे माही!

इश्क़ है तो इज़हार कर
आ इक पल के लिए तो मुझसे प्यार कर।
के जी ले आज उस पल में ज़िंदगी सारी
बिन मेरे जी रहा है तू जिसे मेरे माही!

हम मिले थे
कभी न बिछड़ने के लिए मेरे माही!
तेरी – मेरी भावना के संग
बहने के लिए मेरे माही!
भावनाओं का बहता झरना
किस मोड़ पे ले आया है हमें
के अब ज़िन्दगी तरस रही है,
मरने के लिए मेरे माही!

आ एक बार फिर
एक हो जाते हैं।
इक दूजे की बाहों में
खो जाते हैं।
इस गुजरते लम्हे की कसम है तुझे
के अब के ऐसे मिलें
के फिर न बिछड़ने के लिए मेरे माही!

मेरे माही!
आज भी तू मेरी तलाश में है
दूर ही सही, तू फिर भी मेरे पास में है।
तो फिर क्यूँ जुदा मुझसे होने की ज़िद है तेरी,
कोई खता नहीं, फिर भी सजा देने की ज़िद है तेरी,
के आज मेरा नाम,
तेरे रग – रग के एहसास में है।

- महेश बारमाटे "माही"

शनिवार, 26 जनवरी 2013

प्यार या इमोशनल अत्याचार... ?


इस तकनिकी दुनिया ने रिश्तों की एहमियत भुला दी है, बस 4 दिन की चैटिंग, 4-5 फोन कॉल्स में ही आज कल प्यार हो जाता है और फिर यूँही दिल भी टूट जाता है, बस इसी कहानी को बयां मेरी ये कविता -

रविवार, 13 नवंबर 2011

एक चाहत थी...

एक चाहत थी,
तुमसे मिलने की...
गर पूरी हो पाती तो...

एक चाहत थी,
तेरे संग कुछ वक़्त साथ बिताने की...
गर पूरी हो पाती तो...

एक चाहत थी,
तेरे संग हंसने गाने की...
गर पूरी हो पाती तो...

एक चाहत थी,
तेरी हर ख़ुशी - ओ - गम में तेरा हर पल साथ निभाने की...
गर पूरी हो पाती तो...

एक चाहत थी,
बहुत कुछ समझने - समझाने की...
गर पूरी हो पाती तो...

और आज पूछ रही हो तुम,
के क्या चाहत है मेरी...
अब कैसे कहूँ तुमसे मैं... 
के मेरी तो बस चाहत थी यही... 

तेरे संग सातों जनम बिताने की...
बन के तेरा "माही"
तुझमें खो जाने की...

पर काश पूरी हो पाती तो... !

- महेश बारमाटे "माही" 

मंगलवार, 27 सितंबर 2011

वो एहसास...

पहले हम दोस्त बने,
और फिर
कुछ दिन बाद,
हमारी दोस्ती...
दोस्ती से भी बढ़ कर हो गई...

वो एहसास...
न तो दोस्ती थी
और न ही प्यार था...
वो जो कुछ भी था
शायद हमारी किस्मत को नागवार था...

के अब दरमियाँ हमारे,
न तो दोस्ती रही
और न ही प्यार...
और न ही रहा अब
दोस्ती से भी बढ़कर कुछ और...

मंगलवार, 12 जुलाई 2011

वह, उसकी यादें... और... मैं...

उसे क्यों याद करूँ जो कभी मेरी थी ही नहीं...
ऐ खुदा ! बस एक इल्तिजा है मेरी 
के खुश रखना सदा उसे जिसने मुझे खुश होना सिखाया 
जिसने मेरे गीतों को अपने होंठों से था लगाया 
और जिसने मेरे दिल को एक बार फिर धड़कना था सिखाया...

आज वो जहाँ भी है, शायद खुश है
तो क्यों उसे अपनी मौजूदगी का एहसास दिलाऊं ?
ऐ चाँद ! जा तू उसे रातों को मीठी नींद में सुलाना...
ऐ फलक के तारों ! जाओ तुम उसका आँचल बन जाओ...

जाओ सारी खुशियाँ भर दो झोली में उसकी...
के मेरा जिक्र भी उसे छू न पाए...
मेरे अक्स की परछाई भी उसे याद न आये कभी...
के वो तो चली गई है बिना मुझसे कुछ कहे...
तो आखिर क्यों मैं उसे याद करूँ ?

और क्यों कहूं उसे आज मैं संगदिल 
जब दिल तो बस मैंने था उससे लगाया ?
उसके साथ बीते हर पल को अपनी आँखों में था बिठाया...
के शायद वही था मेरी ज़िन्दगी का सरमाया...

ऐ हवा जा उसके आँचल को सहला,
उसकी जुल्फों में कहीं खो जा
और बस इतना सा काम और कर,
के जब वो तनहा हो अगर...

तो मेरा नाम उसके कानों में जाके धीरे से कहना
देख के कहीं उसे चोट न लग जाये 
जरा प्यार से उसे अपनी बाहों में तुम लेना
और याद दिलाना के आज भी कोई है जो उसे याद करता है

कोई है जो आज भी उसकी तस्वीर को देख के गज़लें लिखा करता है...
आज भी वो मेरी कहानियों में शामिल सी दिखाई देती है...
आज भी कहानी के हर दृश्य में वो मेरी नायिका बन के इठलाती है
आज भी मैं उससे उतना ही प्यार करता हूँ 
और आज भी उसके दीदार का इंतज़ार करता हूँ...

वो मेरी ज़िन्दगी का हर लम्हा चुरा के ले गई
ऐ वक्त ! जरा उसे मेरी कमी महसूस मत करा 
के फूलों सी नाजुक है वो 
कहीं बिखर न जाए 
उसका ख्याल रख 
उसे मेरे दिल में बसा 

के याद नहीं करना उसे अब 
जिसे पाने की तमन्ना आज भी है 
वो दूर ही सही पर मुझे 
ऐ मेरे "माही"!
तुझसे मुहब्बत आज भी है ...

१२ जुलाई २०११ 
4:26 am

गुरुवार, 9 जून 2011

वक्त-ए-कश्मकश...

वो कहते थे कि तेरे बगैर दिल कहीं लगता नहीं "माही",
पर वो मेरा दो पल भी इंतज़ार ना कर सके... 

के दो पल की और ज़िन्दगी मांगने गया था मैं खुदा से उसकी खातिर,
जो कभी वादे पे मेरे ऐतबार ना कर सके...

या खुदा ! खूब देखा तेरी भी रहमत का नज़ारा हमने,
के दे दी ज़िन्दगी फिर उसके लिए, जो हमसे फिर कभी प्यार ना कर सके...

और अब तन्हा हैं ये सोच के,
के शायद हम ही कभी उनसे अपने वादे का ठीक से इज़हार ना कर सके...

आज रो रहे हैं के गम-ए-फुरकत से सामना होगा अब हमारा,
के क्यों हम तुमसे कभी इकरार ना कर सके ?

और जाने वो कैसा वक्त-ए-कश्मकश था "माही"
जब हम भी तेरे प्यार को इन्कार ना कर सके...?

महेश बारमाटे "माही"
9th June 2011

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

वादा...

वो कर गए हम से एक वादा,
निभाने का ये वादा,
के "हम आयेंगे मिलने आपसे, तब - तब,
आप करेंगे हमको याद जब - जब".

मुझको लगा उनकी ये बात, मेरी तकदीर बन गई.
मेरे दिल में भी उनकी एक सुन्दर तस्वीर बन गई. 

पर न आये वो और न आया उनका कोई ख़त.
इतना होने के बाद भी, ये दिल कहता है के "रो मत".

क्योंकि मैं भूल गया था कि
"कुछ लोगों के लिए,
वादा तो बस वादा होता है.
इसमें उनके लिए सच कम
और झूठ ज्यादा होता है".

अब कहता हूँ दुनिया वालों से के 
"करना न कभी किसी से तुम ऐसा वादा,
जिससे मिले ख़ुशी तुमको चाहे कम,
पर दर्द होगा उसको ज्यादा"...

महेश बारमाटे (माही)
१३ मई २००७