उसे क्यों याद करूँ जो कभी मेरी थी ही नहीं...
ऐ खुदा ! बस एक इल्तिजा है मेरी
के खुश रखना सदा उसे जिसने मुझे खुश होना सिखाया
जिसने मेरे गीतों को अपने होंठों से था लगाया
और जिसने मेरे दिल को एक बार फिर धड़कना था सिखाया...
आज वो जहाँ भी है, शायद खुश है
तो क्यों उसे अपनी मौजूदगी का एहसास दिलाऊं ?
ऐ चाँद ! जा तू उसे रातों को मीठी नींद में सुलाना...
ऐ फलक के तारों ! जाओ तुम उसका आँचल बन जाओ...
जाओ सारी खुशियाँ भर दो झोली में उसकी...
के मेरा जिक्र भी उसे छू न पाए...
मेरे अक्स की परछाई भी उसे याद न आये कभी...
के वो तो चली गई है बिना मुझसे कुछ कहे...
तो आखिर क्यों मैं उसे याद करूँ ?
और क्यों कहूं उसे आज मैं संगदिल
जब दिल तो बस मैंने था उससे लगाया ?
उसके साथ बीते हर पल को अपनी आँखों में था बिठाया...
के शायद वही था मेरी ज़िन्दगी का सरमाया...
ऐ हवा जा उसके आँचल को सहला,
उसकी जुल्फों में कहीं खो जा
और बस इतना सा काम और कर,
के जब वो तनहा हो अगर...
तो मेरा नाम उसके कानों में जाके धीरे से कहना
देख के कहीं उसे चोट न लग जाये
जरा प्यार से उसे अपनी बाहों में तुम लेना
और याद दिलाना के आज भी कोई है जो उसे याद करता है
कोई है जो आज भी उसकी तस्वीर को देख के गज़लें लिखा करता है...
आज भी वो मेरी कहानियों में शामिल सी दिखाई देती है...
आज भी कहानी के हर दृश्य में वो मेरी नायिका बन के इठलाती है
आज भी मैं उससे उतना ही प्यार करता हूँ
और आज भी उसके दीदार का इंतज़ार करता हूँ...
वो मेरी ज़िन्दगी का हर लम्हा चुरा के ले गई
ऐ वक्त ! जरा उसे मेरी कमी महसूस मत करा

के फूलों सी नाजुक है वो
कहीं बिखर न जाए
उसका ख्याल रख
उसे मेरे दिल में बसा
के याद नहीं करना उसे अब
जिसे पाने की तमन्ना आज भी है
वो दूर ही सही पर मुझे
ऐ मेरे "माही"!
तुझसे मुहब्बत आज भी है ...
१२ जुलाई २०११
4:26 am