मंगलवार, 13 जुलाई 2021
कुछ तो हुआ..
रविवार, 20 जून 2021
मुझे बेवफा न समझ..
बुधवार, 16 जून 2021
मेरे शहर की खिड़कियाँ
शनिवार, 1 अगस्त 2020
वो, महफ़िल और इश्क़
सोमवार, 11 जून 2018
कुछ तो है... (Kuch toh hai...)
सोमवार, 1 मई 2017
पहले तो ऐसा न था कभी..
पहले तो ऐसा न था
के तुझे देखने की तड़प
तुझे सुनने का एहसास
तुझे छूने की चाह
और तेरा होने की प्यास..
कहाँ था ऐसा कुछ भी
जो भी था
वो
वो जैसे कुछ धुंधला धुंधला सा
याद आता है
पर
जो अब है
वो पहले तो न था
हम
मिलते नहीं थे
अब
साथ रहते हैं
एक दूजे के दिल में
जैसे
अनजान थे पहले
पर अब
बहुत कुछ जान गए हैं
फिर भी जाने क्यों
दिल ये मेरा
तेरे लिए अनजान ही बना रहना चाहता है
ताकि
तुझे और जान सकूँ
पर..
पहले तो ऐसा न था
जो अब है।
ये रिश्ता
एक नए मोड़ पर है
क्या तुझे एहसास है
या
ये बस मेरी प्यास है??
जो भी है
एक धीमी तड़प है
फिर भी सुखद है
जैसे
गुलाब के फूल संग काँटे।
दिल करता है
कभी कभी
तुझे मोबाइल फोन पे ही
अपनी छुअन का एहसास दिलाऊँ
और उसी एहसास में
मैं भी
गुम हो जाऊं
कहीं
खो जाऊँ।
बस
तेरा हो जाऊं..
क्या तुमने सोचा कभी
माही!
पहले तो ऐसा न था कभी..
है न??
महेश_माही
1 मई 2017
10:29 pm
गुरुवार, 17 दिसंबर 2015
ये ज़िन्दगी..
द्रौपदी सी हो गयी है ज़िन्दगी।
किसका कब साथ निभाऊं
कुछ समझ में नहीं आता।
जहाँ देखूँ
वहीँ पे मेरा अपना खड़ा होता है,
पर किसके साथ
कहाँ जाऊँ
कुछ समझ में नहीं आता।
मैंने तो चुना था बस एक को
ठुकरा के जाने कितने अनेक को
फिर भी मिले साथ में और चार
पाँच कश्तियों में सफ़र करूँ अब कैसे
ओ मेरे यार!
इस सफ़र का जाने
कौन असल वाहक होगा?
मिले जो फल मुझको
तो किसका मुझपे हक़ होगा?
गर कभी एक की हुयी ये ज़िंदगानी
तो अगले को मुझपे ही शक होगा।
जाने किस मोड़ पर ज़िन्दगी
कब किसके सीने में मेरे लिए धकधक होगा।
ऐसे ही न जाने कितने
सवालों में हर रोज घूम रही है ज़िन्दगी
पाँच पांडवों के बीच फँसी
आज द्रोपदी सी लग रही है ज़िन्दगी।
हाँ!
ये मेरी ज़िन्दगी!
#महेश_बारमाटे_माही
17 दिसम्बर 15
8:20 am
(ये केवल मेरे विचार हैं, कृपया कर इस कविता को अन्यथा न लें)
शनिवार, 21 नवंबर 2015
सफ़र-ए-दर्द का राही
अपने गुनाहों को याद करता मैं
खुद से ही माफ़ी माँगता
और खुद को ही सजा देता मैं।
हर सजा के बाद
गुनाह खुद मुझसे पूछता
क्यों तूने मुझे किया
और फिर मुझसे रूठता।
न जवाब था
न शर्मिंदगी
जाने किस मोड़ पे आयी
आज ये ज़िन्दगी।
मैं जागता रहा
गुनहगार की तरह
सोती रही क़िस्मत
जाने किस जगह।
आ
अब न माफ़ कर
मुझे मेरे माही!
के सजा भी मेरी
गुनाह भी मेरा
मैं सफ़र-ए-दर्द का हूँ एक राही।
#महेश_बारमाटे_माही
21 Nov 2015
6:25 pm
शुक्रवार, 13 नवंबर 2015
जाने क्यों..?
तब कुछ खास नहीं लगे तुम
पर शायद
कोई तो बात थी तुममे
जिस कारण
मैने तुमसे
दोस्ती करना चाही।
हममे
धीरे धीरे
बात
बातों की शुरुआत हुई।
फिर इन्हीं
बातों बातों में
मैं तुम्हे जानने लगी।
तुम इतना सच बोलते थे
कि अक्सर डर लगता था मुझे
कि अगर
हमारा रिश्ता आगे बढ़ता है तो
हम कैसे एक रह पाएंगे
बस इसी डर से
मैंने तुमको ठुकरा दिया था।
पर
जाने तुझमे क्या बात थी
जो तुम मुझे
अपने पास
वापस ले आये।
मैं फिर आई
तुम्हारी ज़िन्दगी में।
बस तुमको सुनने के लिये
मैं तुमसे बात करने लगी
बस तुमको देखने के लिए
तुम्हारी फोटो तुमसे मांगने लगी।
सब जानती थी मैं
तुम्हारे बारे में
कि तुम इश्क़ के काबिल नहीं
फिर भी
अब मैं तुमसे प्यार
करने लगी।
पर रहना था मुझे
प्यार से दूर
बस इसीलिए मैं
इन्कार करने लगी।
और फिर वही हुआ
जब तुमने सच में
इन धड़कनों को छुआ।
पर तुमने धोखा दिया
मुझे अपना के मुझसे दगा किया।
और चले गए दूर मुझसे
जाने क्यों हुए इतने मजबूर खुद से।
मैंने भी तब
तुमसे दूर जाने का
फैसला किया
पर दिल है कि मानता नहीं
ये आज भी
तुझे सुनने की ज़िद करता है
चोरी छुपे हर रोज
ये बस तुझको ही पढ़ता है।
सोचती हूँ
कि अब तो तुम बहुत दूर हो माही!
पर फिर भी
ये दिल मेरा
बस तुम्हारे लिए ही आज भी
जाने क्यों धड़कता है।
पता नहीं..
आखिर क्यों??
#महेश_बारमाटे_माही
शुक्रवार, 27 जून 2014
जवाब-ए-ख़त...
के तेरे इंतज़ार में, मैं भी अपना पता भूल बैठा हूँ...
दिन भूल बैठा हूँ
शाम भूल बैठा हूँ
जो रूठा था मैं तुझसे
वो खता भूल बैठा हूँ।
लिखता रहता था
ख़त तेरी याद में
आज मैं अपना ही
फलसफ़ा भूल बैठा हूँ...
अब तू मिल जाये
तेरी किस्मत होगी
कभी सुना था फरिस्तों से
वो किस्मत का लिखा भूल बैठा हूँ।
जा रहा हूँ अब मैं
मीलों दूर तेरी दुनिया से
तुझे जो बनायी मंज़िल अपनी
तो हर रस्ता भूल बैठा हूँ।
क्या लिखना था तेरे लिए
और क्या लिख बैठा हूँ
मैं तो तेरे इश्क़ में माही!
खुद का खुद से रिश्ता भूल बैठा हूँ...।
- महेश बारमाटे "माही"
शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014
मेरा कल...
ऐसा लगता है कि जैसेकल की ही बात हो
कल ही हम मिले
और कल ही बिछड़ गए
कल ही दिल मिले
कल ही प्यार हुआ
कल ही कल में
इजहार - ओ - इक़रार हुआ
कल ही कल में
कई ज़िंदगियाँ गुजारी
कल ही कल में
खोयी और फिर पायी हमने खुमारी।
कल ही कल में
सातों जनम जी गए
और
कल ही कल में
हम मर गए
कल ही कल
कल ही कल
कल ही कल
जाने क्यूँ नही बीतता आज
मेरा वो... बीता हुआ कल?
आज मेरे
उस कल में
बीत गईं सारी खुशियाँ
और सारे ग़म...
सारे रिश्ते - नाते
वो पल
जिनमे हम थे
हँसते - गाते ।
अब क्या है
पास मेरे
ये सोचता हूँ
तो याद आता है मुझे
मेरा कल।
माही!
तू उस पल से इस पल तक
मेरे कल से, मेरे कल तक
आज भी है साथ मेरे
यादों में, बाहों में
नज़रों में, निगाहों में
शामिल है
मेरे काबिल है
जैसे हो
तू मेरा आज
और
तू ही मेरा कल...
- महेश बारमाटे "माही"
गुरुवार, 27 मार्च 2014
चार दिन की ज़िंदगी ...
फिर जाने क्या समा होगा
आ भर ले फिर बाँहों में मुझे कुछ पल के लिए
फिर कहाँ प्यार का मौसम जवां होगा...
कुछ पल बैठ सामने मेरे
डूब जाने दे इन झील सी आँखों में मुझको
के मौत करीब है अब तो मेरे
फिर कहाँ तेरी आँखों का किनारा होगा ?
कुछ बात कर
आज सुबह से रात कर
ले चल चाँद - तारों के बीच मुझे
के फिर कहाँ सितारों भरा ये आसमान होगा।
मेरी ज़िंदगी के चार दिन
अब न बीते ये तेरे बिन
बस तेरी ख़्वाहिश है माही!
इसे पूरा कर
फिर कहाँ तेरी बाहों का सहारा होगा...
- महेश बारमाटे "माही"
शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013
उसने कहा था...
उसने कहा था,
के जब कभी भी तुम लौटो वापस, तो मुझे याद करना...
किसी से कुछ मत कहना,
पर सब से पहले मुझसे ही तुम बात करना...
मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013
वो...
नादान थी वो जाने कैसी...
के अपने हर पल में खुद को संग मेरे देखना चाहती थी...
वो जानती थी के ये पल कभी ठहरता नहीं,
और फिर भी
मुझे वक़्त के हाथों से मांगना चाहती थी...
एक ख्वाब उसने भी देखा था शायद,
वक़्त की दीवार में वो भी कुछ कुरेदना चाहती थी...
वो जो भी थी मुझे पुकारती थी कह के माही!
शायद अपना नाम मेरे नाम के संग जोड़ना चाहती थी...
- महेश बारमाटे "माही"
24 जनवरी 2013
गुरुवार, 17 जनवरी 2013
मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012
मैं... आज फिर... लिख रहा हूँ...
आज...लिख रहा हूँ...
हाँ ! मैं फिर लिख रहा हूँ...
पर क्यों ?
क्यों छोड़ा था मैंने...
लिखना...?
क्या...?
भूल गया था मैं...
खुद से ही कुछ...
सीखना...?
जाने कितने...
मंज़र बीत गए...और दिल को कितने...
खंजर चीर गए... ?
फिर भी क्यों...?
हाँ... हाँ क्यों...?
मैं कुछ लिख न पाया...?
देख के कई... सपने...
मैं खुद सपनों सा क्यों,
दिख न पाया... ?
देखो आज फिर,
लिख रहा हूँ...
फिर एक नई शुरुआत करना
सीख रहा हूँ...
हाँ!
हाँ! आज मैं कुछ...
लिख रहा हूँ...
माही !
लिख रहा हूँ न ? ...
इंजी० महेश बारमाटे "माही"
9 Oct 2012
10:35 pm








