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रविवार, 10 अगस्त 2014

पराया..

क्या चाहूँ
और क्या हो जाता है,
जिसे चाहूँ
वो पराया हो जाता है।

इश्क़ की आबो-हवा
मेरी महफ़िल में न थी कभी
जीता रहता हूँ ग़लतफ़हमी में अक्सर
करीब जाऊं तो दिलबर मेरा
बस एक साया हो जाता है।

समझ भी न पाया कभी
और जान भी न पाया कभी
ये इश्क़ है या और कुछ
इक पल में ही किया धरा
सब जाया हो जाता है।

या रब!
बहुत देखी तेरी खुदाई
मिला के क्यूँ दी ये जुदाई
कोई अब तक न अपना सका इस दिल को माही!
और हमेशा ये दिल ही क्यूँ पराया हो जाता है।

- महेश बारमाटे "माही"

सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

वो तन्हा सर्द रातें...

तन्हा सर्द रातें,
बस कटती हैं
यूँ ही 
कर कर के खुद से ही बातें।

वो कहती है के 
तुम मुझको क्यों याद नहीं करते ?
पर कैसे बताऊँ अब उसे मैं के 
वो कौन सा पल है 
जब खुद से उसकी बात नहीं करते ...

वो रूठ गई है मुझसे 
बिना  मेरी गलती बताए ...
आखिर जाने किस तरह जी रही होगी वो 
बिना मुझको सताए ?

मुझे मालूम है 
के उसे मेरी आदत है,
वो मेरी ज़रूरत नहीं शायद
पर वो ही मेरी चाहत है ...

जाने कितने ख्वाब 
टटोलता मैं माही !
तेरे अक्स का आज भी पीछा कर रहा हूँ।
तुम हो या नहीं 
इसका मुझे पता नहीं 
पर आज भी इन सर्द रातों में मैं 
तन्हाई के संग 
बस मर रहा हूँ।

- महेश बारमाटे "माही"

शनिवार, 26 जनवरी 2013

प्यार या इमोशनल अत्याचार... ?


इस तकनिकी दुनिया ने रिश्तों की एहमियत भुला दी है, बस 4 दिन की चैटिंग, 4-5 फोन कॉल्स में ही आज कल प्यार हो जाता है और फिर यूँही दिल भी टूट जाता है, बस इसी कहानी को बयां मेरी ये कविता -

गुरुवार, 17 जनवरी 2013

रविवार, 18 मार्च 2012

दोस्ती और प्यार...


ऐ साजन मेरे !
जब तुम होते हो साथ मेरे...  
भूल जाता हूँ मैं सारा जहां,
हर शख्स, हर रिश्ता और हर दोस्त मेरा...
पर माफ कर देना तुम मुझे
के जब दोस्त हो कोई साथ मेरे
मैं तुझे कभी भूलता नहीं
पर उनका साथ आने देता नहीं
कभी तेरी याद
के दोस्ती और प्यार
होते हैं जैसे
इक़रार और एतबार...

सोमवार, 23 जनवरी 2012

क्या लिखूँ ?

क्या लिखूँ ?

ज़िंदगी को लिखूँ दुःख की परिभाषा,
या कोई सुनहरा ख्वाब लिखूँ ?

हर पल रुलाता और सताता
ग़मों का पहाड़ लिखूँ...?
या हर पल मिलती 
खुशियों का संसार लिखूँ ?

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

तेरा "माही" हूँ मैं... (maahi hoon main)

तेरी रातों का आलम हूँ मैं,
तेरी ज़िन्दगी के सातों जनम हूँ मैं...
मैं तो हूँ तेरी जुल्फों को सहलाती ठंडी हवा,
और तेरे बदन को भिगोता सावन हूँ मैं...

खुशबु तेरे बदन की,
मुझसे ही फ़ैल रही है फिज़ा में...
आजा ओ मेरी दिलरुबा !
छुपा लूं तुझे आगोश में अपनी...
के तेरा दिलबर, तेरा साजन हूँ मैं...

वो तेरे लबों की सुर्ख लाली,
वो तेरी जुल्फों की घटाएं काली - काली,
और वो तेरे मस्त नैनों की अदा मतवाली...
के मैं तो हूँ तेरा वक़्त और तेरा हमदम हूँ मैं...

वो तेरा शबाब-ए-हुस्न,
और तेरा महकता जिस्म,
मैं तो हूँ तेरी रग - रग में शामिल,
के तेरी मांग को सजाता कुमकुम हूँ मैं...

वो तेरा अदा से आँखें झुकाना,
और तेरा लातों को अपनी उँगलियों से खेलना और इतराना...
कभी तेरा शर्म से भी ज्यादा शर्माना...
तो कभी तेरी हया का दामन हूँ मैं...

वो तेरा बात - बात पे मुस्काना,
मुझसे बात करते वक़्त किसी की आहट से तेरा सहम जाना...
मैं तो हूँ तेरे लबों पे रूकती हर बात,
कभी उलफ़त-ए-शमा में मरता परवाना,
तो कभी जन्मों से तेरी उलफ़त में जीता तेरा "माही"...
तेरा जानम हूँ मैं...

- महेश बारमाटे "माही"