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बुधवार, 9 मई 2018

मेरे गाँव वाले घर में..



छोटे - छोटे दरवाजे

मोटी - मोटी दीवारें थीं

मेरे गाँव वाले घर में

न किसी के दिल में दरारें थीं।


बड़े छोटे से कमरे में

पूरा परिवार रहता था

सुख - दुख के सारे मौसम

हर कोई संग सहता था।


पुरानी एक तश्वीर टंगी थी

पुरखों वाले कोने में

डर का कोई सवाल नहीं था

घुप्प अँधेरों में सोने में।


नीम की छाँव में बीते शामें

दादी - नानी की कहानियों में सदियों के कारनामे 

बीत जाता था पूरा साल

पहन के चंद फटे पायजामें।


छोटी सी खुशी में भी

पूरा गाँव खुश होता था

ग़म की अगर खबर मिले तो

पूरा गाँव संग हमारे रोता था।


आधुनिकता की भागदौड़ में

वो छोटा दर-ओ-दरवाजा टूट गया

जानें कहाँ गया वो जीवन माही!

लगे जैसे भगवान हमसे रुठ गया..।


- महेश बारमाटे "माही"

7 मई 2018

शनिवार, 13 सितंबर 2014

कब ?

कब रोका था मैंने तुझे माही!
मेरी ज़िंदगी में आने से
और दिल तोड़ कर फिर जाने से...

मुझे अपना बनाने से
मुझे पलकों में छुपाने से
मेरी दुनिया में आ के
कुछ देर रुक के
मुझे यूं ही सताने से

सता के
मुहब्बत में
फिर रूठ जाने से
रूठ के बस यूं ही मुझसे
फिर दूर जाने से
कब रोका था मैंने तुझे
ज़िंदगी को मेरी
छीन कर ले जाने से
और मौत को भी
मुझसे दूर ले जाने से

दूर ले जा के
तन्हाइयों को भी
मुझसे खफा करवाने से
न चाहते हुये भी
एक बार फिर
मुझसे कोई खता करवाने से

कब रोका था मैंने तुझे माही!
मेरी ज़िंदगी में आने से
और दिल तोड़ कर फिर जाने से...

- महेश बारमाटे "माही"

शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

कभी कभी तू यूं ही...

कभी कभी तू यूं ही दिख जाता है
तस्वीरों में मुझको
पर ऐ खुदा!
क्यूँ नहीं मिलता वो
मेरी तक़दीरों में मुझको।

कोई तो खता की होगी
गए जनम में हमने
के हर पल पाता हूँ
जंजीरों में खुद को।

प्यार देने आया हूँ
प्यार ही देना चाहता हूँ
पर जाने हो गई है
आज नफरत क्यूँ तुझको।

चल जी लें एक बार फिर
बन के अजनबी माही!
के वो मिलाता है हर बार ही
अजनबियों से मुझको।

- महेश बारमाटे “माही”

रविवार, 1 जून 2014

ज़िंदगी के मायने...

ज़िंदगी के मायने 
ज़िंदगी भर ढूंढते रहेंगे
अगर तुझे खो दिया
तो जाने कहाँ ढूंढते रहेंगे।

अब दीदार की तमन्ना है
इक मुलाकात की तमन्ना है।
तू अगर किसी और का हो गया
तो खुद को हम कोसते रहेंगे।

तुझे पाने की ख़्वाहिश नहीं
अपना बनाने की ख्वाहिश नहीं,
बस तुझमे समाना है,
अगर बिखर गया तो
फिर खुद को कहाँ खोजते रहेंगे।

एक बार आ
मुझ में समा जा
बसा के मन मंदिर में माही!
तुझे हर वक़्त
पूजते रहेंगे।

- महेश बारमाटे "माही"

बुधवार, 28 मई 2014

मेरी हकीकत...


जो छुपा ही नहीं
उसे कैसे करूँ उजागर
मेरी हकीकत
आ जान ले तू
एक बार मेरे करीब आकर।

के मेरी कहानी
एक खुली किताब
जिसमें हैं कुछ भेद
और कुछ राज़
बेहिसाब ।

हर पन्ने की हकीकत को
जरा नजदीक से तू पढ़
और फिर जो है सच्ची कहानी
तू अपनी जुबानी
ख्वाबों में तू गढ़।

तेरी रूह का नूर
और मेरा गुरूर
जैसे मैं कोई कतरा
और तू जन्नत की हूर।

बस है आज
जुबां पे मेरे
मेरी कहानी
हँसते लबों के बीच
जैसे
अश्कों का बहता पानी।

पानी में है एक नैया
खोती जा रही है ऐसे
क्षितिज पे मिल रहे हों
जमीन-ओ-आसमां जैसे।

अब कहाँ है जमीन
और आसमां मेरा
तू खुद ढूँढ
कौन था मैं
और क्या हूँ तेरा।

एक अक्स
एक एहसास
तुझसे बहुत दूर
फिर भी हूँ
तेरे पास।

पास इतना
के तुझे मुझ पे एतबार नहीं
और दूर हूँ
के मैं तेरा प्यार नहीं।

फिर भी एक इल्तिजा है
के जान मुझे
आ जा
और करीब से पहचान मुझे।

कर दे उजागर
मेरी हकीकत
परिंदे सी क़ैद ज़िंदगी
फ़ना कर
मेरी शिद्दत।

हर बार की तरह
फिर एक बार
मेरा हो जा
ओ मेरे माही!
रास्तों को बदल
थोड़ा मेरी तरफ भी तो चल
बस कुछ पल
बन के मेरा
बस मेरा
हमराही...।

- महेश बारमाटे "माही"

गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

मेरे माही!


इश्क़ करता है तू
मुझसे मेरे माही!
पर जाने डरता है तू
किस से मेरे माही!

ये चाहत भी अजीब होती है।
हर पल मैं – तेरे और तू – मेरे करीब होती है।
फिर भी जुदा – जुदा सा फिरता है तू
मुझसे मेरे माही!

इश्क़ है तो इज़हार कर
आ इक पल के लिए तो मुझसे प्यार कर।
के जी ले आज उस पल में ज़िंदगी सारी
बिन मेरे जी रहा है तू जिसे मेरे माही!

हम मिले थे
कभी न बिछड़ने के लिए मेरे माही!
तेरी – मेरी भावना के संग
बहने के लिए मेरे माही!
भावनाओं का बहता झरना
किस मोड़ पे ले आया है हमें
के अब ज़िन्दगी तरस रही है,
मरने के लिए मेरे माही!

आ एक बार फिर
एक हो जाते हैं।
इक दूजे की बाहों में
खो जाते हैं।
इस गुजरते लम्हे की कसम है तुझे
के अब के ऐसे मिलें
के फिर न बिछड़ने के लिए मेरे माही!

मेरे माही!
आज भी तू मेरी तलाश में है
दूर ही सही, तू फिर भी मेरे पास में है।
तो फिर क्यूँ जुदा मुझसे होने की ज़िद है तेरी,
कोई खता नहीं, फिर भी सजा देने की ज़िद है तेरी,
के आज मेरा नाम,
तेरे रग – रग के एहसास में है।

- महेश बारमाटे "माही"

गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012

मेरा मन...


कुंठाओ से घिरा हुआ ये मन
आज पुकार रहा है तुम्हें
के तुम कहाँ हो
कहाँ हो तुम के ये दिल अब
बिन तुम्हारे न तो जी रहा है और न मर रहा है
बस तुम से मिलने की आखिरी आस में
आज तो ये अपनी आखिरी साँस  में
तुम्हारा ही नाम बार बार
कभी दिल के इस पार तो कभी उस पार
बस यूं ही
शायद बेवजह
या शायद एक वजह से ही
तुम्हारा नाम
अपने नाम के साथ
हर जगह
लिख रहा है...

- इंजी॰ महेश बारमाटे "माही"
25/10/2012

मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012

मैं... आज फिर... लिख रहा हूँ...

आज...
लिख रहा हूँ...
हाँ ! मैं  फिर लिख रहा हूँ...

पर क्यों ?
क्यों छोड़ा था मैंने...
लिखना...?

क्या...?
भूल गया था मैं...
खुद से ही कुछ...
सीखना...?

जाने कितने...
मंज़र बीत गए...
और दिल को कितने...
खंजर चीर गए... ?

फिर भी क्यों...?
हाँ... हाँ क्यों...?
मैं कुछ लिख न पाया...?
देख के कई... सपने...
मैं खुद सपनों सा क्यों,
दिख न पाया... ?

देखो आज फिर,
लिख रहा हूँ...
फिर एक नई शुरुआत करना
सीख रहा हूँ...

हाँ!
हाँ! आज मैं कुछ...
लिख रहा हूँ...

माही !
लिख रहा हूँ न ? ...


इंजी० महेश बारमाटे "माही"
9 Oct 2012
10:35 pm

शनिवार, 3 मार्च 2012

इंतज़ार...

इंतज़ार...

कभी - कभी कितना सुखद होता है
और कभी क्यों ये होता है दुःखद ...?

गर इश्क़ हो किसी से,
तो ये कीचड़ में खिलते कंवल सा होता है...
और कभी ये होता है केवल एक गहरा दलदल
गर हो ये कोई बस एक ज़रूरत...

कभी किसी के इंतज़ार में
हम बिता देते हैं कई सदियाँ
तो कभी कटता ही नहीं
एक और पल...

रविवार, 18 सितंबर 2011

इक नई सरगम...

सुबह की पहली किरण का आगाज,
देखो ले के आया है एक नया दिन, एक नया आज।

वो देखो चली आ रही है ठंडी पुरवाई,
के लगता है जैसे इसने रात के संग होली हो मनाई।

पंछियों का ये सुरम्य संगीत,
पल भर में हर किसी को बना ले ये अपना मीत।

शनिवार, 10 सितंबर 2011

वो... मुझसे पूछा करती थी...

वो हर सुबह मुझसे 
मेरा ख्वाब पूछा करती थी...
कैसा था वो बीती रात का 
बादलों के पीछे छिपता महताब पूछा करती थी...। 

बुधवार, 31 अगस्त 2011

किस्मत का लिखा...

सुबह - सुबह तैयार होकर,
निकाल पड़ता हूँ मैं,
अपनों से दूर,
एक ऐसी मंज़िल की ओर,
जिसे पाना मेरी नियति में न था,
पर किस्मत ने मेरी,
इसे पाने पर मुझे मजबूर कर दिया।

आज ज़िंदगी मेरी मुझे,
एक ऐसे रास्ते पर ले जा रही है,
जिसपे चल पाना,
मेरे सपनों में भी दूभर था,
पर जाने ये कैसी घड़ी है,
जिसने मुझे अपने लिए भी
जीने न दिया...

दिल कोस कोस के
हर रोज मुझे
धिक्कार रहा है
और दे रहा है हर पल
ये आवाज,
के ऐ महेश !
आखिर तू ने ये क्या कर लिया ?

अब इस दिल को,
कैसे समझाऊँ मैं,
के शायद मैंने,
कुछ भी नहीं है किया...
बस मेरी किस्मत ने ही मुझे,
शायद खुद के लिए कभी,
कुछ करने ही न दिया।

फिर भी दिल में,
आस अब भी बाकी है,
के फिर एक सपने को
जीना है मुझे,
फिर तैयार होना है,
किस्मत से लड़ने के लिए,
के इस हार ने तुझे "माही"
जीने के लिए
फिर जीवित है कर दिया...।

के जीना ही होगा,
इक सपने को,
इस बार,
वरना मर जाएगा "माही"
हमेशा...., हमेशा के लिए तू,
और हो जाएगा
खत्म तेरा वजूद...
गर तूने अबकी बार,
किस्मत के लिखे को
फिर स्वीकार कर लिया...

- महेश बारमाटे "माही"
29 अगस्त 2011
9:17 am 

चित्र आभार : गूगल (google search)

सोमवार, 15 अगस्त 2011

चलो एक नया जहां बसाते हैं...


सर्वप्रथम आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं... 
चलो एक नया जहां बसाते हैं,
कहीं से थोड़ी सी जमीन ढूंढ के लाते हैं...। 

प्यार की बरखा से, स्नेह के नए पुष्प खिलाते हैं,
स्वर्ग से भी बढ़ कर, चलो कोई जहाने-मुहब्बत बसाते हैं...। 

चलो आसमां से तारों की, भस्म चुन के लाते हैं, 
के आज इस धरती को, दुल्हन की तरह सजाते हैं...। 

चलो एक नया जहां बसाते हैं...।

एक ऐसा जहां, जहाँ सरहदों का कोई अस्तित्व न हो...
और बैर, क्रोध, मोह - माया का भी, कोई मित्र न हो...। 

न हो जहाँ कुछ भी कभी तेरा - मेरा,
आपसे भाईचारे से हो शुरू, हमारा हर सवेरा...। 

बस मानवता के एक मात्र धर्म को,
अपने दिलों मे बसाते हैं... 
ऐ मेरे माही !
चल एक नया जहां बसाते हैं...। 

तोड़ के सारी दीवारों को, 
अपनी सोच का दायरा बढ़ाते हैं... 
के थम जाये जहाँ सोच तुम्हारी,
बस उतना ही बड़ा जहां बनाते हैं...। 

छोड़ के आज अपने भाग्य का साथ,
चल आज कर्म को हम अपनाते हैं... 
एक ईश्वर की परिभाषा को,
फिर लिख के दोहराते हैं...। 

सुन ऐ नर, सुन ऐ नारी !
सुन ओ वन और वन्य प्राणी !
चलो मिल जुल कर हम,
एक सपना साकार बनाते हैं। 

आज चुन कर एक नयी राह,
चलो एक नया जहां बसाते हैं...। 

एक नया जहां बसाते हैं
      एक नया जहां बसाते हैं...

- महेश बारमाटे "माही"
12th Aug 2011


मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

बेवफा

जब उनको दिल लगाना न आया,
तो उन्होंने हमसे दिल्लगी कर ली.
पर हम तो समझे इसे दिल की लगी,
और इश्क में उनके हमने, खुदकुशी कर ली.

जब मेरी मौत पर उन्होंने, दो आँसू बहाए तो लगा,
के मेरी मुहब्बत को ज़न्नत मिल गया...
पर उनके झूठे अश्कों की धार में
मेरा सारा वहम धुल गया...

मुझे लगा के वो भी मुझसे सच्चा प्यार करते हैं,
पर वो तो एक आशिक के दिल से सिर्फ खिलवाड़ करते हैं.

उन्होंने जब माँगी,
तो उनके इश्क में हमने भी दे दी जान,
पर वो आज तक न सके,
कभी मेरे प्यार को पहचान...

मेरी मौत को वो भूल गए, एक दुर्घटना समझ कर.
और मेरे साथ को वो भूल गए, शायद एक बुरा सपना समझ कर.

तभी तो आज मेरी मुहब्बत ही मुझ पर हँस रही है
जैसे कोई नागिन, फन फैलाये मुझे डस रही है.

अब उनको कैसे मैं कह दूँ, "बेवफा"
जब मेरी किस्मत ने ही न की कभी मुझसे कोई वफ़ा ?

इसलिए ऐ सनम !
आज मैं तुझको माफ़ करता हूँ...
तुझे न मिले कभी ऐसा कोई धोखा,
यही खुदा से आज मैं फरियाद करता हूँ...

महेश बारमाटे "माही"
27th Oct. 2007