रविवार, 16 अगस्त 2015

वो प्यार नहीं था..

वो...

वो प्यार नहीं था,
के जब तुमसे दूर जाने की बात
मैंने तुमसे कही थी
तो तुमने मुझे
न जाने कितनी बददुआएं,
कितनी बुरी बातें
कितने बुरे विचार
बस मेरे लिए ही तुम्हारे लबों से
कही होगी।

उन लबों से
हाँ! उन्हीं लबों से
जिसकी कभी मैंने अपनी किसी कविता में
या किसी शायरी में
सुर्खी की तारीफ़ें
कही होगी।
 
तुमने उस रात
मुझे सुनना ही नहीं चाहा
और न ही उसके बाद कभी,
क्या पता
दिल ने तुम्हारे
शायद मेरी कोई बात
तुमसे कही होगी।
वो प्यार नहीं था
के फैसला मेरा था
तुमसे दूर जाने का
के शायद
मेरे प्यार में थी कुछ कमी
जो तुमको अपनी
मजबूरी का पता चलने न दिया।
तुमसे बिछड़ के
तुम्हारी बददुआओं के साथ
जी लिया
और आज भी
जी रहा हूँ
“तुम कभी खुश नहीं रहोगे”
ये बात तुमने दिल से
कही होगी।  

तभी तो
आज मैं बस जी रहा हूँ
और खुश हूँ अपने सच्चे दिलबर के साथ
पर कहीं न कहीं
तुम्हारे दिल की बात
ऊपर वाले ने शायद
सुनी होगी
और
मैं और मेरा दिलबर
तुम्हारी बददुआओं के घेरे में
खुशी खुशी
ग़मों से लड़ रहे हैं
फिर भी
कभी मैंने तुमको
कोई बददुआ नहीं दी
के दिल में मेरे
कहीं प्यार नहीं था
पर प्यार में मुझे
बस दुआ ही देना आता है
पर शायद
वो प्यार नहीं था
जो तुमने मुझसे किया था।
तभी तो...

- महेश बारमाटे "माही"
16 अगस्त 2015

3 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, मदनलाल ढींगरा जी की १०६ वीं पुण्यतिथि - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. बहुत ही उम्दा भावाभिव्यक्ति....
    आभार!
    इसी प्रकार अपने अमूल्य विचारोँ से अवगत कराते रहेँ।
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

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