शनिवार, 26 जनवरी 2013

प्यार या इमोशनल अत्याचार... ?


इस तकनिकी दुनिया ने रिश्तों की एहमियत भुला दी है, बस 4 दिन की चैटिंग, 4-5 फोन कॉल्स में ही आज कल प्यार हो जाता है और फिर यूँही दिल भी टूट जाता है, बस इसी कहानी को बयां मेरी ये कविता -
इस वर्चुअल वर्ल्ड में
मुझे भी प्यार हुआ ... 
मेरे प्यार का इक़रार हुआ,
हज़ार मर्तबा ...
इज़हार हुआ...।

कुछ गलतफहमियों का,
मैं भी शिकार हुआ ...
कुरेदा दिल को हर खुशफहमी ने मेरी,
के टूट के आज आखिरकार दिल मेरा
इमोशनली तार तार हुआ ...।

मैं रोया के सीने से दिल मेरा 
जार जार हुआ...।
वो रोई के उसका दिल भी आज 
ख़ाकसार हुआ...।

कोसा इक दूजे को हमने,
और ऐसा एक नहीं कई बार हुआ...।
फिर भी नहीं अपनी
गलतियों का हमें इकरार हुआ...।

आज वो सिर्फ एक याद है
जिसके संग बीता हर पल मेरा
गुल-ए-गुलज़ार हुआ...।
और यकीनन मैं भी,
बस उसके लिए ही,
बेईमान और बेकार हुआ...।

खता तो थी हमारी ही, 
जिसका हमें न कभी एतबार हुआ...।
और हमारे ही हाँथों,
इमोशंस का हमारे बलात्कार हुआ...।

दोनों ही तरफ,
सच और इमोशंस के बीच 
एक भीषण WAR हुआ...।
अब तुम ही कहो 
ऐ माही मेरे !
के कब हमारे बीच था 
सच्चा प्यार हुआ ?

इसी विषय पर मैंने एक लेख भी लिखा है शायद आपको पसंद आये - 
http://meri-mahfil.blogspot.in/2013/01/i-love-you-virtually.html

- इंजी॰ महेश बारमाटे "माही"
23 जनवरी 2013 

8 टिप्‍पणियां:

  1. सही कहा है ऐसा ही होता है...
    बेहतरीन भावपूर्ण रचना...

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  2. महेश जी अच्छी कविता हे ,पर एक बात और की लगता हे आप बहुत भावुक हे ,पर जन्हा तक मुझे लगता हे प्यार व्यार कुछ होता नहीं ,ये सिर्फ आकर्षण से ज्यादा कुछ नहीं होता ,शाश्वत प्रेम तो एक निरंतर धारा की तरह प्रवाहित होता हैं जो हर किसी के लिए होता हे न की व्यक्ति विशेष के लिए .


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  3. प्रभावशाली ,
    जारी रहें।

    शुभकामना !!!

    आर्यावर्त
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  4. बहुत सुन्दर.
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  5. प्यार में यही जानना तो सबसे मुश्किल होता है :)

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