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सोमवार, 11 जून 2018

कुछ तो है... (Kuch toh hai...)


कुछ अंदर दबा हुआ सा है
चुभता है ठूंठ सा
अपनी आवाज को भी नहीं सुनता मैं
चीखता हूँ गूँज सा।

एक तरफ तन्हाइयों का शोर है
दूजी तरफ ग़मों का सन्नाटा पसरा हुआ है
किस तरफ रखूँ कदम अपने
फर्श पे मेरा मैं बिखरा हुआ है।

अपनी लाश पे चलके
निकल जाना है
ऐ दुनिया! तुझसे मेरा
ऐसा ही रिश्ता पुराना है।

तेरा रस्ता देखते
सदियाँ गुजर गई
कैसे तू आता माही!
के वादों की अब तो राहें बदल गई

- महेश बारमाटे "माही"

सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

वो तन्हा सर्द रातें...

तन्हा सर्द रातें,
बस कटती हैं
यूँ ही 
कर कर के खुद से ही बातें।

वो कहती है के 
तुम मुझको क्यों याद नहीं करते ?
पर कैसे बताऊँ अब उसे मैं के 
वो कौन सा पल है 
जब खुद से उसकी बात नहीं करते ...

वो रूठ गई है मुझसे 
बिना  मेरी गलती बताए ...
आखिर जाने किस तरह जी रही होगी वो 
बिना मुझको सताए ?

मुझे मालूम है 
के उसे मेरी आदत है,
वो मेरी ज़रूरत नहीं शायद
पर वो ही मेरी चाहत है ...

जाने कितने ख्वाब 
टटोलता मैं माही !
तेरे अक्स का आज भी पीछा कर रहा हूँ।
तुम हो या नहीं 
इसका मुझे पता नहीं 
पर आज भी इन सर्द रातों में मैं 
तन्हाई के संग 
बस मर रहा हूँ।

- महेश बारमाटे "माही"

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

मैं तन्हा ही रहा...

मैं हर पल रहा, हर महफ़िल में उनकी,
फिर भी न जाने क्यों, हर दम मैं तन्हा ही रहा...?

दिल से मिल के मैंने,
दी हर किसी को इस दिल में पनाह,
फिर भी जाने क्यों हर दम,
मैं बेपनाह ही रहा?

हर कश्ती का मुसाफिर मुझसे,
रास्ता पूछता गया
और खुद समंदर में होके भी मैं,
साहिल की तलाश में प्यासा ही रहा...

किसका रास्ता देखूँ अब मैं, 
के हर एक मुसाफिर है यूँ निकल गया,
के दिल का ज़हां,
मेले में भी हरदम वीराना ही रहा...

किसी ने कहा था मुझसे,
के ये दौर यूँ ही गुजर जायेगा...
और बीते दिन याद करता मैं.
बीती रात बस रोता ही रहा...

देखो कैसे भूल बैठा है, मेरा "माही"!
के मैं भी कभी संग था उसके
और दिल में हर - पल,
उसकी मुहब्बत का आँसू हरदम,
बस चमकता ही रहा...

महेश बारमाटे "माही"
८ मई २०११