तन्हा सर्द रातें,
वो कहती है के
तुम मुझको क्यों याद नहीं करते ?
पर कैसे बताऊँ अब उसे मैं के
वो कौन सा पल है
जब खुद से उसकी बात नहीं करते ...
वो रूठ गई है मुझसे
बिना मेरी गलती बताए ...
आखिर जाने किस तरह जी रही होगी वो
बिना मुझको सताए ?
मुझे मालूम है
के उसे मेरी आदत है,
वो मेरी ज़रूरत नहीं शायद
पर वो ही मेरी चाहत है ...
जाने कितने ख्वाब
टटोलता मैं माही !
तेरे अक्स का आज भी पीछा कर रहा हूँ।
तुम हो या नहीं
इसका मुझे पता नहीं
पर आज भी इन सर्द रातों में मैं
तन्हाई के संग
बस मर रहा हूँ।
- महेश बारमाटे "माही"

