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बुधवार, 9 मई 2018

मेरे गाँव वाले घर में..



छोटे - छोटे दरवाजे

मोटी - मोटी दीवारें थीं

मेरे गाँव वाले घर में

न किसी के दिल में दरारें थीं।


बड़े छोटे से कमरे में

पूरा परिवार रहता था

सुख - दुख के सारे मौसम

हर कोई संग सहता था।


पुरानी एक तश्वीर टंगी थी

पुरखों वाले कोने में

डर का कोई सवाल नहीं था

घुप्प अँधेरों में सोने में।


नीम की छाँव में बीते शामें

दादी - नानी की कहानियों में सदियों के कारनामे 

बीत जाता था पूरा साल

पहन के चंद फटे पायजामें।


छोटी सी खुशी में भी

पूरा गाँव खुश होता था

ग़म की अगर खबर मिले तो

पूरा गाँव संग हमारे रोता था।


आधुनिकता की भागदौड़ में

वो छोटा दर-ओ-दरवाजा टूट गया

जानें कहाँ गया वो जीवन माही!

लगे जैसे भगवान हमसे रुठ गया..।


- महेश बारमाटे "माही"

7 मई 2018

शनिवार, 21 जून 2014

दिल के किसी कोने में...

दिल के किसी कोने में
एक दर्द छुपा रखा है
अपनी तन्हाइयों को मैंने
खुद से बचा रखा है...

जाने किस दर्द की
दवा बन के तू आया था
के तेरा ग़म भी मैंने
अपने इस दर्द-ए-दिल से बचा रखा है।

रोता है दिल
तन्हाइयों में अक्सर
की थी जो दुआ - खुशी की तेरी
इसीलिए इन अश्कों को मैंने
आँखों में जमा रखा है...

एक नदी सी थमी है
कुछ - कुछ बर्फ भी जमी है
सैलाब है कोई तेज़ाबों का
आज अपना हर दर्द जला रखा है ।

वो तो लिख गया कहानी मेरी
बरसों पहले "माही"
आज जाना के क्यों दिल ने खुद को
दर्द का कब्रिस्तान बना रखा है।

- महेश बारमाटे "माही"

बुधवार, 28 मई 2014

मेरी हकीकत...


जो छुपा ही नहीं
उसे कैसे करूँ उजागर
मेरी हकीकत
आ जान ले तू
एक बार मेरे करीब आकर।

के मेरी कहानी
एक खुली किताब
जिसमें हैं कुछ भेद
और कुछ राज़
बेहिसाब ।

हर पन्ने की हकीकत को
जरा नजदीक से तू पढ़
और फिर जो है सच्ची कहानी
तू अपनी जुबानी
ख्वाबों में तू गढ़।

तेरी रूह का नूर
और मेरा गुरूर
जैसे मैं कोई कतरा
और तू जन्नत की हूर।

बस है आज
जुबां पे मेरे
मेरी कहानी
हँसते लबों के बीच
जैसे
अश्कों का बहता पानी।

पानी में है एक नैया
खोती जा रही है ऐसे
क्षितिज पे मिल रहे हों
जमीन-ओ-आसमां जैसे।

अब कहाँ है जमीन
और आसमां मेरा
तू खुद ढूँढ
कौन था मैं
और क्या हूँ तेरा।

एक अक्स
एक एहसास
तुझसे बहुत दूर
फिर भी हूँ
तेरे पास।

पास इतना
के तुझे मुझ पे एतबार नहीं
और दूर हूँ
के मैं तेरा प्यार नहीं।

फिर भी एक इल्तिजा है
के जान मुझे
आ जा
और करीब से पहचान मुझे।

कर दे उजागर
मेरी हकीकत
परिंदे सी क़ैद ज़िंदगी
फ़ना कर
मेरी शिद्दत।

हर बार की तरह
फिर एक बार
मेरा हो जा
ओ मेरे माही!
रास्तों को बदल
थोड़ा मेरी तरफ भी तो चल
बस कुछ पल
बन के मेरा
बस मेरा
हमराही...।

- महेश बारमाटे "माही"

गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

मेरे माही!


इश्क़ करता है तू
मुझसे मेरे माही!
पर जाने डरता है तू
किस से मेरे माही!

ये चाहत भी अजीब होती है।
हर पल मैं – तेरे और तू – मेरे करीब होती है।
फिर भी जुदा – जुदा सा फिरता है तू
मुझसे मेरे माही!

इश्क़ है तो इज़हार कर
आ इक पल के लिए तो मुझसे प्यार कर।
के जी ले आज उस पल में ज़िंदगी सारी
बिन मेरे जी रहा है तू जिसे मेरे माही!

हम मिले थे
कभी न बिछड़ने के लिए मेरे माही!
तेरी – मेरी भावना के संग
बहने के लिए मेरे माही!
भावनाओं का बहता झरना
किस मोड़ पे ले आया है हमें
के अब ज़िन्दगी तरस रही है,
मरने के लिए मेरे माही!

आ एक बार फिर
एक हो जाते हैं।
इक दूजे की बाहों में
खो जाते हैं।
इस गुजरते लम्हे की कसम है तुझे
के अब के ऐसे मिलें
के फिर न बिछड़ने के लिए मेरे माही!

मेरे माही!
आज भी तू मेरी तलाश में है
दूर ही सही, तू फिर भी मेरे पास में है।
तो फिर क्यूँ जुदा मुझसे होने की ज़िद है तेरी,
कोई खता नहीं, फिर भी सजा देने की ज़िद है तेरी,
के आज मेरा नाम,
तेरे रग – रग के एहसास में है।

- महेश बारमाटे "माही"

गुरुवार, 17 जनवरी 2013

मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012

मैं... आज फिर... लिख रहा हूँ...

आज...
लिख रहा हूँ...
हाँ ! मैं  फिर लिख रहा हूँ...

पर क्यों ?
क्यों छोड़ा था मैंने...
लिखना...?

क्या...?
भूल गया था मैं...
खुद से ही कुछ...
सीखना...?

जाने कितने...
मंज़र बीत गए...
और दिल को कितने...
खंजर चीर गए... ?

फिर भी क्यों...?
हाँ... हाँ क्यों...?
मैं कुछ लिख न पाया...?
देख के कई... सपने...
मैं खुद सपनों सा क्यों,
दिख न पाया... ?

देखो आज फिर,
लिख रहा हूँ...
फिर एक नई शुरुआत करना
सीख रहा हूँ...

हाँ!
हाँ! आज मैं कुछ...
लिख रहा हूँ...

माही !
लिख रहा हूँ न ? ...


इंजी० महेश बारमाटे "माही"
9 Oct 2012
10:35 pm

शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

वो कुछ ख़ास है...

आज बहुत दिनों बाद मेरी कलम से कुछ शब्द दिल की आवाज को बयान करते मिले हैं... उम्मीद है आपको पसंद आएगी...। 

वो कुछ ख़ास है... 

वो दूर है,
और वो पास भी...
वो कुछ नहीं है,
पर वो ख़ास भी...

सोचता हूँ उसे,
और मानता हूँ उसे...
वो अगले कई जन्मों की तलाश है,
और वो एक प्यास भी... 

रोता हूँ उसके लिए,
और हँसता हूँ मैं संग उसके...
उससे इन्कार है मुझे
और उससे प्यार भी...

वो है मेरी ज़िंदगी का हर एक लम्हा,
फिर भी हूँ मैं अब तक तन्हा...
उसकी राहे-मंजिल हूँ मैं,
और वो मेरा साहिल भी...।

हूँ बेवफा मैं, बस उसके लिए...
और निभाई है वफा, शायद बस खुद के लिए...
 तू मेरी जीत का आगाज है माही !
और दिल की हार का साज भी...

तू दूर है...
और पास भी...
तू कुछ नहीं....
पर ख़ास भी...

- महेश बारमाटे "माही"
28 सितंबर 2012

रविवार, 18 मार्च 2012

दोस्ती और प्यार...


ऐ साजन मेरे !
जब तुम होते हो साथ मेरे...  
भूल जाता हूँ मैं सारा जहां,
हर शख्स, हर रिश्ता और हर दोस्त मेरा...
पर माफ कर देना तुम मुझे
के जब दोस्त हो कोई साथ मेरे
मैं तुझे कभी भूलता नहीं
पर उनका साथ आने देता नहीं
कभी तेरी याद
के दोस्ती और प्यार
होते हैं जैसे
इक़रार और एतबार...

शनिवार, 3 मार्च 2012

इंतज़ार...

इंतज़ार...

कभी - कभी कितना सुखद होता है
और कभी क्यों ये होता है दुःखद ...?

गर इश्क़ हो किसी से,
तो ये कीचड़ में खिलते कंवल सा होता है...
और कभी ये होता है केवल एक गहरा दलदल
गर हो ये कोई बस एक ज़रूरत...

कभी किसी के इंतज़ार में
हम बिता देते हैं कई सदियाँ
तो कभी कटता ही नहीं
एक और पल...

मंगलवार, 27 सितंबर 2011

वो एहसास...

पहले हम दोस्त बने,
और फिर
कुछ दिन बाद,
हमारी दोस्ती...
दोस्ती से भी बढ़ कर हो गई...

वो एहसास...
न तो दोस्ती थी
और न ही प्यार था...
वो जो कुछ भी था
शायद हमारी किस्मत को नागवार था...

के अब दरमियाँ हमारे,
न तो दोस्ती रही
और न ही प्यार...
और न ही रहा अब
दोस्ती से भी बढ़कर कुछ और...

रविवार, 18 सितंबर 2011

इक नई सरगम...

सुबह की पहली किरण का आगाज,
देखो ले के आया है एक नया दिन, एक नया आज।

वो देखो चली आ रही है ठंडी पुरवाई,
के लगता है जैसे इसने रात के संग होली हो मनाई।

पंछियों का ये सुरम्य संगीत,
पल भर में हर किसी को बना ले ये अपना मीत।

शनिवार, 10 सितंबर 2011

वो... मुझसे पूछा करती थी...

वो हर सुबह मुझसे 
मेरा ख्वाब पूछा करती थी...
कैसा था वो बीती रात का 
बादलों के पीछे छिपता महताब पूछा करती थी...। 

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

ये मेरी किस्मत...


जिसे पाने की उम्मीद पे चला हूँ,
वो मंजिल तो कभी दिखाई ही नहीं देती। 
के हर रहगुज़र बन के मेरा हमसफर,
अक्सर मुझे यूं ही तन्हा छोड़ गया। 

पर फिर भी जाने किस उम्मीद में जी रहा हूँ,
के कभी तो मंज़िल को पा ही लूँगा। 
और वो भी फिर आएगा एक बार फिर पास मेरे,
जो पिछली दफ़ा मुझसे था मुंह मोड़ गया। 

आज आसमाँ से गिरी एक बूंद भी मुझको,
तूफाँ की तरह भिगो गई, 
लगा के जैसे मंद हवा का इक हल्का सा झोंका,
भी मुझे झँझोड़ गया। 

जाने कितने जतन किए होंगे मैंने, 
इन लबों को फिर खुशी देने के वास्ते...
पर किस्मत का हर ज़र्रा हर बार मेरा,
हर करम निचोड़ गया...। 

फिर भी आज बैठा हूँ मैं इसी आस मे,
के लगता है मंज़िल अब भी यहीं कहीं है मेरे पास में।
और कह रहा है कोई इस दिल से,
के एक नज़र फिर देख इधर ओ मेरे "माही"!
वो जाता "लम्हा" भी किस्मत का फिर एक नया, दरवाजा खोल गया। 

महेश बारमाटे "माही"
19 जुलाई 2011
4.32 pm

मंगलवार, 31 मई 2011

मैं तो बस मोमबत्ती हूँ...

तिल-तिल करके जलती हूँ,
जग को रौशन करती हूँ,
शाम से लेकर रात तक
हर बूँद मैं पिघला करती हूँ...

अंधियारे के संग लड़ती हूँ,
हर पल खुद का दमन करती हूँ,
जल-जल के ही तो मरती हूँ,
के हर बूँद मैं पिघला करती हूँ...

किसी ने यूँ ही,
तो किसी ने मूर्त (रूप) देके मुझको जलाया,
गम इसका कभी नहीं करती हूँ,
के हर बूँद मैं पिघला करती हूँ...

मेरी हर मौत को उसने,
न जाने कैसे था भुलाया,
के जब भी जला करती हूँ,
घर उसका रौशन करती हूँ...

मेरी शमा को देख के,
कभी कोई परवाना भी था इतराया,
जला के उसको भी मैं,
नाम उसका रौशन करती हूँ...

मैं तो बस मोमबत्ती हूँ 
हर लौ में जला करती हूँ
कभी उफ़ भी नहीं करती हूँ 
के हर बूँद मैं पिघला करती हूँ...

मत भूल मेरे वजूद को "माही",
मैं तो बस एक मोमबत्ती हूँ,
सदियों पहले जो करती थी,
वो आज भी किया करती हूँ...

घर तेरा रौशन करती हूँ,
और अंधियारे से भी लड़ती हूँ,
मर के भी जिंदा रहती हूँ,
के हर बूँद को जिया करती हूँ...

महेश बारमाटे "माही"
२५ मई २०११ 

गुरुवार, 26 मई 2011

अब ये दर्द सहा नहीं जाता

कभी कभी किसी का मजाक
किसी को दर्द दे जाता है...
या अल्लाह ! तू ऐसे रिश्ते आखिर किस लिए बनाता है ?

 के दिल दुखता होगा तेरा भी...
जब कोई इन्सां किसी की मौत बन जाता है.

किसी का चैनो-सुकून छीन के वो
अपनी नयी दुनिया बसाता है.

और फिर कोई तीसरा आकर,
तेरी कायनात को ज़मीन के टुकड़ों में बाँट जाता है.

तेरे ही नाम पर खुद को तेरा
अजीज़ बताने वाला इन्सां, मज़हबी दंगे करवाता है.


कोई अपनी माँ का
तो कोई सारे हिन्दुस्तां का 
दिल चीरता चला जाता है.
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
हे परम पिता परमेश्वर !

क्या इसी तरह की तू दुनिया बनाना चाहता है ?

क्या तेरे दिल में दर्द नहीं होता,
जब एक छोटा सा मजाक दो दिलों को तन्हा कर जाता है ?

जब एक सच्चा दोस्त,
अपने दोस्त को रुसवा कर जाता है ? 
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
ऐ खुदा !

मालुम है के तुझे भी
हमारा दुःख तन्हा कर जाता है...

तेरी ही दुनिया में हर इन्सां
तुझे ही रुसवा कर जाता है...

तो फिर तोड़ के सारे बंधन
आजा हमें गले लगा ले,
ले अब तो तन्हा रहा नहीं जाता है...
और तेरी तन्हाई का भी
दर्द सहा नहीं जाता है...

के लाख मर्तबा टूट चूका है "माही"
तेरे इंतजार में,
अब तो इस सारी कायनात से
 तेरे बिन रहा नहीं जाता है...

महेश बारमाटे "माही"
17th March 2011

सोमवार, 16 मई 2011

कहाँ बनाऊं मैं अपना शीशे जैसा महल...

कहाँ बनाऊं मैं अपना शीशे जैसा महल,
अब तो हर एक के हाथ में पत्थर नज़र आता है.

कहाँ छुपाऊं मैं इन अश्कों इन आंसुओं को,
अब तो हर एक कतरा समंदर नजर आता है...

दिल का अफसाना दिल में ही रह गया,
जिसे सुनाना चाहता था, वह दोस्त भी कहीं खो गया.
किसे बताऊँ अब अपने दिल का हाल,
अब तो हर दोस्त सितमगर नज़र आता है...

रकीबों की साजिश ने, उसको भी मेरा दुश्मन बना दिया,
मेरी यादों को उसने, न जाने कैसे भुला दिया ?
पर आज भी इन आँखों को मेरा इंतजार करता, वो मेरा दिलबर नज़र आता है...

कहाँ बनाऊं मैं अपना शीशे जैसा महल,
अब तो हर एक के हाथ में पत्थर नज़र आता है.

जब तक मेरा हमसफ़र मेरे पास था,
उसका हर एक साया मेरे साथ था.
पर आज तो वह सिर्फ मेरे ख्वाबों में ही आता है,
और आकर कमबख्त बड़ा सताता है,
फिर भी मेरा दिल आज भी उस पर ही प्यार बरसाता है.

तरस गयी हैं आँखे उसका दीदार करने को,
नूर न रहा और अब आँखें भी चली गयीं मेरी,
अब तो इस बेजान शरीर को बस उसी का सहारा नज़र आता है.

उसकी जुदाई ने मेरी हालत ऐसी है कर दी,
के अब तो मुझे हर जगह,
मौत का खंज़र नज़र आता है..
और आज मेरी मौत का मुझे,
सच होता मंज़र नज़र आता है...

- विकास तिवारी और महेश बारमाटे "माही" (VBar)
१० जुलाई २००८...

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नोट - ये कविता मैंने अपने कॉलेज के दोस्त विकास तिवारी के संग मिलकर कॉलेज के दिनों में लिखी थी. उसके साथ मिलकर हमने २ - ३ और भी कवितायें लिखीं. और हमने अपने इस लेखन को नाम देने के लिए एक नया नाम सोचा था "वी बार (VBar)"... 
आज विकास मेरे पास नहीं पर मुझे यकीन है की हम फिर एक दिन फिर से और भी कवितायें लिखेंगे... 

बुधवार, 11 मई 2011

तड़प

मेरा चाँद न जाने कहाँ खो गया है,
लगता है जैसे बादलों की ओंट में छुपकर कहीं सो गया है...

बस उसी को ढूँढती है मेरी नज़र
अब तो हर रात,
न जाने कब कटेगी ये
अमावस की ये काली अँधेरी रात.

उसको देखे न जाने कितने हो गए हैं बरस,
बस उसी के लिए ये आँखे अब तक रही हैं तरस.

उसके बगैर मैं अब चाँद का चकोर हो गया हूँ.
लोग भी कहने लगे हैं के मैं तो अब, पंख कटा मोर हो गया हूँ.

फिर भी दिल में एक आस है
के मैं ढूँढ निकालूँगा उसे 
और मिल जाये तो
इस दिल के मन-मंदिर में सजा लूँगा उसे...


मेरे मन में उससे मिलने की बड़ी आस है,
क्योंकि उसकी एक तस्वीर आज भी मेरे दिल के बहुत पास है.

मैंने तो बस उससे ही मिलने की चाहत की है 
ज़िन्दगी में पहली और आखिरी बार बस उसी से मुहब्बत की है...

इसीलिए ऐ कायनात!
तू अब मुझे मेरा चाँद दिखा दे,
मेरे इतने बड़े इंतजार का मुझे
कुछ तो सिला दे.

कहीं ऐसा न हो के उसे देखे बगैर ही 
मैं इस दुनिया से चला जाऊँ.
जिसकी एक झलक झलक के लिए जी रहा हूँ मैं,
उसको कभी देख ही न पाऊँ.

उसकी यादें ही अब मेरे जीने का एक मात्र सहारा है,
इस दिल के आसमाँ एक बार करे वो रौशन,
बस यही आखिरी अरमाँ हमारा है.

के उसको देखे बागी इस जहाँ से मैं जाना नहीं चाहता.
जिंदगी की आखिरी ख्वाहिश में मैं,
उसके सिवा और किसी को पाना नहीं चाहता...

महेश बारमाटे "माही"

सोमवार, 9 मई 2011

चाहत मेरी...

दिल जानता था ये बात,
के न दोगी कभी तुम मेरा साथ...

फिर भी मैंने तुमसे ही प्यार किया,
दिल के बदले दर्द-ए-दिल मैंने तुमसे ही लिया...

प्यार क्या होता है, ये मैंने न था कभी जाना,
और तुमसे मिलकर ही मैंने था शायद इसे पहचाना.
पर जब खाया मैंने तुमसे धोखा,
तो लगा के शायद अब भी हूँ मैं सच्चे प्यार से अनजाना...

गलती मेरी ही थी शायद,
जो मैंने इसे प्यार समझा...
रहना था दूर जिससे मुझे,
उसे ही अपना दिलबर, अपना दिलदार समझा...

तुम्हे अपना समझ के मैंने,
"मैं क्या हूँ ?" ये भी तुमको बताया...
इशारों - इशारों में ही सही,
अपना हाल-ए-दिल भी मैंने तुमको समझाया...

पर मुझे क्या पता था, के तू अपने जैसा सबको समझेगी,
मेरे प्यार को महज एक दिल्लगी समझेगी...

मेरी हर कहानी में तुम थी,
मेरी हर कविता में भी तुम थी...
आँखों से जो कभी बहे, उस पानी में तुम थी...
मेरे दिल ने जो चाही थी लिखनी,
हर उस कहानी में भी तुम थी...

पर अब तू मेरे लिए, सिर्फ एक कहानी हो गई है...
तेरी हर एक अदा मेरे लिए, अब पुरानी हो गई है...

क्योंकि जो कुछ लिखा था मैंने तेरे लिए,
उसकी आज ये दुनिया दीवानी हो गई है...
मैं भूल चूका हूँ तुझे,
और तू अब दुनिया की भीड़ में खड़ी अनजानी हो गई है...

मुझे पता है के ये बातें सुनकर भी,
तुझको कोई फर्क नहीं पड़ेगा...
मेरी किसी बददुआ से भी तुझको,
कभी नर्क नहीं मिलेगा...

क्योंकि मैं चाहता हूँ के तुझको
दुनिया भर की हर ख़ुशी मिले...
और उस हर एक ख़ुशी में तुझको,
हर बार मेरी ही कमी मिले...

- महेश बारमाटे "माही"
२२ अप्रेल २००८ 

जरा यहाँ भी गौर फरमाइए... 

मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

दूरियाँ हैं बढ़ने लगीं दरमियाँ हमारे...

अनचाही सरहदें हैं खिंचने लगीं, अब दरमियाँ हमारे...
बेवजह ही दूरियाँ हैं बढ़ने लगीं, अब दरमियाँ हमारे...

तेरा आना ज़िन्दगी में मेरी,
अब एक ख्वाब हो गया है.
के पल-पल में ही टूटने लगे हैं रिश्ते,
अब नींद और दरमियाँ हमारे...

जनता हूँ के हम कुछ भी न थे कभी ज़िन्दगी में उनकी,
पर दूरियाँ इतनी भी न थी कभी दरमियाँ हमारे...

अब तो लगता है 
के जान - पहचान का ही रह गया है
बस रिश्ता दरमियाँ हमारे...

के आज उसका शोना - माही
छिपने लगा है वक़्त की धुंध में,
के जब से अजनबी कोई,
इश्क उनका बन के आया है दरमियाँ हमारे...

ऐ सनम ! एक बार तो जरा,
इनायत कर मुझ पे ओ निर्ज़रा !
के लगता है आज मौत खड़ी है,
फिर रिश्तों के दरमियाँ हमारे...

आज फिर है देख रहा ये माही !
खुद को एक दो-रहे पर खड़ा...
के तेरी सोच के संग ऐ सनम !
बदलने लगा है अब सब कुछ,
बस दरमियाँ हमारे...

महेश बारमाटे "माही"
26th Apr. 2011

बेवफा

जब उनको दिल लगाना न आया,
तो उन्होंने हमसे दिल्लगी कर ली.
पर हम तो समझे इसे दिल की लगी,
और इश्क में उनके हमने, खुदकुशी कर ली.

जब मेरी मौत पर उन्होंने, दो आँसू बहाए तो लगा,
के मेरी मुहब्बत को ज़न्नत मिल गया...
पर उनके झूठे अश्कों की धार में
मेरा सारा वहम धुल गया...

मुझे लगा के वो भी मुझसे सच्चा प्यार करते हैं,
पर वो तो एक आशिक के दिल से सिर्फ खिलवाड़ करते हैं.

उन्होंने जब माँगी,
तो उनके इश्क में हमने भी दे दी जान,
पर वो आज तक न सके,
कभी मेरे प्यार को पहचान...

मेरी मौत को वो भूल गए, एक दुर्घटना समझ कर.
और मेरे साथ को वो भूल गए, शायद एक बुरा सपना समझ कर.

तभी तो आज मेरी मुहब्बत ही मुझ पर हँस रही है
जैसे कोई नागिन, फन फैलाये मुझे डस रही है.

अब उनको कैसे मैं कह दूँ, "बेवफा"
जब मेरी किस्मत ने ही न की कभी मुझसे कोई वफ़ा ?

इसलिए ऐ सनम !
आज मैं तुझको माफ़ करता हूँ...
तुझे न मिले कभी ऐसा कोई धोखा,
यही खुदा से आज मैं फरियाद करता हूँ...

महेश बारमाटे "माही"
27th Oct. 2007