फिर भी न जाने क्यों, हर दम मैं तन्हा ही रहा...?
दिल से मिल के मैंने,
दी हर किसी को इस दिल में पनाह,
फिर भी जाने क्यों हर दम,
मैं बेपनाह ही रहा?
हर कश्ती का मुसाफिर मुझसे,
रास्ता पूछता गया
और खुद समंदर में होके भी मैं,
साहिल की तलाश में प्यासा ही रहा...
किसका रास्ता देखूँ अब मैं,
के हर एक मुसाफिर है यूँ निकल गया,
के दिल का ज़हां,
मेले में भी हरदम वीराना ही रहा...
किसी ने कहा था मुझसे,
के ये दौर यूँ ही गुजर जायेगा...
और बीते दिन याद करता मैं.
बीती रात बस रोता ही रहा...
देखो कैसे भूल बैठा है, मेरा "माही"!
के मैं भी कभी संग था उसके
और दिल में हर - पल,
उसकी मुहब्बत का आँसू हरदम,
बस चमकता ही रहा...
महेश बारमाटे "माही"
८ मई २०११

