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रविवार, 18 मार्च 2012
मंगलवार, 27 सितंबर 2011
वो एहसास...
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शनिवार, 10 सितंबर 2011
शुक्रवार, 29 जुलाई 2011
ये मेरी किस्मत...
जिसे पाने की उम्मीद पे चला हूँ,
वो मंजिल तो कभी दिखाई ही नहीं देती।
के हर रहगुज़र बन के मेरा हमसफर,
अक्सर मुझे यूं ही तन्हा छोड़ गया।
पर फिर भी जाने किस उम्मीद में जी रहा हूँ,
के कभी तो मंज़िल को पा ही लूँगा।
और वो भी फिर आएगा एक बार फिर पास मेरे,
जो पिछली दफ़ा मुझसे था मुंह मोड़ गया।
आज आसमाँ से गिरी एक बूंद भी मुझको,
तूफाँ की तरह भिगो गई,
लगा के जैसे मंद हवा का इक हल्का सा झोंका,
भी मुझे झँझोड़ गया।
जाने कितने जतन किए होंगे मैंने,
इन लबों को फिर खुशी देने के वास्ते...
पर किस्मत का हर ज़र्रा हर बार मेरा,
हर करम निचोड़ गया...।
फिर भी आज बैठा हूँ मैं इसी आस मे,
के लगता है मंज़िल अब भी यहीं कहीं है मेरे पास में।
और कह रहा है कोई इस दिल से,
के एक नज़र फिर देख इधर ओ मेरे "माही"!
वो जाता "लम्हा" भी किस्मत का फिर एक नया, दरवाजा खोल गया।
महेश बारमाटे "माही"
19 जुलाई 2011
4.32 pm
गुरुवार, 9 जून 2011
वक्त-ए-कश्मकश...
वो कहते थे कि तेरे बगैर दिल कहीं लगता नहीं "माही",
पर वो मेरा दो पल भी इंतज़ार ना कर सके...
के दो पल की और ज़िन्दगी मांगने गया था मैं खुदा से उसकी खातिर,
जो कभी वादे पे मेरे ऐतबार ना कर सके...
या खुदा ! खूब देखा तेरी भी रहमत का नज़ारा हमने,
के दे दी ज़िन्दगी फिर उसके लिए, जो हमसे फिर कभी प्यार ना कर सके...
और अब तन्हा हैं ये सोच के,
के शायद हम ही कभी उनसे अपने वादे का ठीक से इज़हार ना कर सके...
आज रो रहे हैं के गम-ए-फुरकत से सामना होगा अब हमारा,
के क्यों हम तुमसे कभी इकरार ना कर सके ?
और जाने वो कैसा वक्त-ए-कश्मकश था "माही"
जब हम भी तेरे प्यार को इन्कार ना कर सके...?
महेश बारमाटे "माही"
9th June 2011
मंगलवार, 31 मई 2011
मैं तो बस मोमबत्ती हूँ...
जग को रौशन करती हूँ,
शाम से लेकर रात तक
हर बूँद मैं पिघला करती हूँ...
अंधियारे के संग लड़ती हूँ,
हर पल खुद का दमन करती हूँ,
जल-जल के ही तो मरती हूँ,
के हर बूँद मैं पिघला करती हूँ...
किसी ने यूँ ही,
तो किसी ने मूर्त (रूप) देके मुझको जलाया,
गम इसका कभी नहीं करती हूँ,
के हर बूँद मैं पिघला करती हूँ...
मेरी हर मौत को उसने,
न जाने कैसे था भुलाया,
के जब भी जला करती हूँ,
घर उसका रौशन करती हूँ...
मेरी शमा को देख के,
कभी कोई परवाना भी था इतराया,
जला के उसको भी मैं,
नाम उसका रौशन करती हूँ...
मैं तो बस मोमबत्ती हूँ
हर लौ में जला करती हूँ
कभी उफ़ भी नहीं करती हूँ
के हर बूँद मैं पिघला करती हूँ...
मत भूल मेरे वजूद को "माही",
मैं तो बस एक मोमबत्ती हूँ,
सदियों पहले जो करती थी,
वो आज भी किया करती हूँ...
घर तेरा रौशन करती हूँ,
और अंधियारे से भी लड़ती हूँ,
मर के भी जिंदा रहती हूँ,
के हर बूँद को जिया करती हूँ...
महेश बारमाटे "माही"
२५ मई २०११
गुरुवार, 26 मई 2011
अब ये दर्द सहा नहीं जाता
किसी को दर्द दे जाता है...
या अल्लाह ! तू ऐसे रिश्ते आखिर किस लिए बनाता है ?
के दिल दुखता होगा तेरा भी...
जब कोई इन्सां किसी की मौत बन जाता है.
किसी का चैनो-सुकून छीन के वो
अपनी नयी दुनिया बसाता है.
और फिर कोई तीसरा आकर,
तेरी कायनात को ज़मीन के टुकड़ों में बाँट जाता है.
तेरे ही नाम पर खुद को तेरा
अजीज़ बताने वाला इन्सां, मज़हबी दंगे करवाता है.
तो कोई सारे हिन्दुस्तां का
दिल चीरता चला जाता है.
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
हे परम पिता परमेश्वर !
क्या इसी तरह की तू दुनिया बनाना चाहता है ?
क्या तेरे दिल में दर्द नहीं होता,
जब एक छोटा सा मजाक दो दिलों को तन्हा कर जाता है ?
जब एक सच्चा दोस्त,
अपने दोस्त को रुसवा कर जाता है ?
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
ऐ खुदा !
मालुम है के तुझे भी
हमारा दुःख तन्हा कर जाता है...
तेरी ही दुनिया में हर इन्सां
तुझे ही रुसवा कर जाता है...
तो फिर तोड़ के सारे बंधन
आजा हमें गले लगा ले,
ले अब तो तन्हा रहा नहीं जाता है...
और तेरी तन्हाई का भी
दर्द सहा नहीं जाता है...
के लाख मर्तबा टूट चूका है "माही"
तेरे इंतजार में,
अब तो इस सारी कायनात से
तेरे बिन रहा नहीं जाता है...
महेश बारमाटे "माही"
17th March 2011
बुधवार, 11 मई 2011
तड़प
मेरा चाँद न जाने कहाँ खो गया है,
लगता है जैसे बादलों की ओंट में छुपकर कहीं सो गया है...
बस उसी को ढूँढती है मेरी नज़र
अब तो हर रात,
न जाने कब कटेगी ये
अमावस की ये काली अँधेरी रात.
उसको देखे न जाने कितने हो गए हैं बरस,
बस उसी के लिए ये आँखे अब तक रही हैं तरस.
उसके बगैर मैं अब चाँद का चकोर हो गया हूँ.
लोग भी कहने लगे हैं के मैं तो अब, पंख कटा मोर हो गया हूँ.
फिर भी दिल में एक आस है
के मैं ढूँढ निकालूँगा उसे
और मिल जाये तो
इस दिल के मन-मंदिर में सजा लूँगा उसे...
मेरे मन में उससे मिलने की बड़ी आस है,
क्योंकि उसकी एक तस्वीर आज भी मेरे दिल के बहुत पास है.
मैंने तो बस उससे ही मिलने की चाहत की है
ज़िन्दगी में पहली और आखिरी बार बस उसी से मुहब्बत की है...
इसीलिए ऐ कायनात!
तू अब मुझे मेरा चाँद दिखा दे,
मेरे इतने बड़े इंतजार का मुझे
कुछ तो सिला दे.
कहीं ऐसा न हो के उसे देखे बगैर ही
मैं इस दुनिया से चला जाऊँ.
जिसकी एक झलक झलक के लिए जी रहा हूँ मैं,
उसको कभी देख ही न पाऊँ.
उसकी यादें ही अब मेरे जीने का एक मात्र सहारा है,
इस दिल के आसमाँ एक बार करे वो रौशन,
बस यही आखिरी अरमाँ हमारा है.
के उसको देखे बागी इस जहाँ से मैं जाना नहीं चाहता.
जिंदगी की आखिरी ख्वाहिश में मैं,
उसके सिवा और किसी को पाना नहीं चाहता...
महेश बारमाटे "माही"
सोमवार, 9 मई 2011
चाहत मेरी...
दिल जानता था ये बात,
के न दोगी कभी तुम मेरा साथ...
फिर भी मैंने तुमसे ही प्यार किया,
दिल के बदले दर्द-ए-दिल मैंने तुमसे ही लिया...
प्यार क्या होता है, ये मैंने न था कभी जाना,
और तुमसे मिलकर ही मैंने था शायद इसे पहचाना.
पर जब खाया मैंने तुमसे धोखा,
तो लगा के शायद अब भी हूँ मैं सच्चे प्यार से अनजाना...
गलती मेरी ही थी शायद,
जो मैंने इसे प्यार समझा...
रहना था दूर जिससे मुझे,
उसे ही अपना दिलबर, अपना दिलदार समझा...
तुम्हे अपना समझ के मैंने,
"मैं क्या हूँ ?" ये भी तुमको बताया...
इशारों - इशारों में ही सही,
अपना हाल-ए-दिल भी मैंने तुमको समझाया...
पर मुझे क्या पता था, के तू अपने जैसा सबको समझेगी,
मेरे प्यार को महज एक दिल्लगी समझेगी...
मेरी हर कहानी में तुम थी,
मेरी हर कविता में भी तुम थी...
आँखों से जो कभी बहे, उस पानी में तुम थी...
मेरे दिल ने जो चाही थी लिखनी,
हर उस कहानी में भी तुम थी...
पर अब तू मेरे लिए, सिर्फ एक कहानी हो गई है...
तेरी हर एक अदा मेरे लिए, अब पुरानी हो गई है...
क्योंकि जो कुछ लिखा था मैंने तेरे लिए,
उसकी आज ये दुनिया दीवानी हो गई है...
मैं भूल चूका हूँ तुझे,
और तू अब दुनिया की भीड़ में खड़ी अनजानी हो गई है...
मुझे पता है के ये बातें सुनकर भी,
मेरी किसी बददुआ से भी तुझको,
कभी नर्क नहीं मिलेगा...
क्योंकि मैं चाहता हूँ के तुझको
दुनिया भर की हर ख़ुशी मिले...
और उस हर एक ख़ुशी में तुझको,
हर बार मेरी ही कमी मिले...
- महेश बारमाटे "माही"
२२ अप्रेल २००८
जरा यहाँ भी गौर फरमाइए...
मंगलवार, 26 अप्रैल 2011
दूरियाँ हैं बढ़ने लगीं दरमियाँ हमारे...
अनचाही सरहदें हैं खिंचने लगीं, अब दरमियाँ हमारे...
बेवजह ही दूरियाँ हैं बढ़ने लगीं, अब दरमियाँ हमारे...
तेरा आना ज़िन्दगी में मेरी,
अब एक ख्वाब हो गया है.
के पल-पल में ही टूटने लगे हैं रिश्ते,
अब नींद और दरमियाँ हमारे...
जनता हूँ के हम कुछ भी न थे कभी ज़िन्दगी में उनकी,
पर दूरियाँ इतनी भी न थी कभी दरमियाँ हमारे...
अब तो लगता है
के जान - पहचान का ही रह गया है
बस रिश्ता दरमियाँ हमारे...
के आज उसका शोना - माही
छिपने लगा है वक़्त की धुंध में,
के जब से अजनबी कोई,
इश्क उनका बन के आया है दरमियाँ हमारे...
ऐ सनम ! एक बार तो जरा,
इनायत कर मुझ पे ओ निर्ज़रा !
के लगता है आज मौत खड़ी है,
फिर रिश्तों के दरमियाँ हमारे...
आज फिर है देख रहा ये माही !
खुद को एक दो-रहे पर खड़ा...
के तेरी सोच के संग ऐ सनम !
बदलने लगा है अब सब कुछ,
बस दरमियाँ हमारे...
महेश बारमाटे "माही"
26th Apr. 2011
बेवफा
तो उन्होंने हमसे दिल्लगी कर ली.
पर हम तो समझे इसे दिल की लगी,
और इश्क में उनके हमने, खुदकुशी कर ली.
जब मेरी मौत पर उन्होंने, दो आँसू बहाए तो लगा,
के मेरी मुहब्बत को ज़न्नत मिल गया...
पर उनके झूठे अश्कों की धार में
मेरा सारा वहम धुल गया...
मुझे लगा के वो भी मुझसे सच्चा प्यार करते हैं,
पर वो तो एक आशिक के दिल से सिर्फ खिलवाड़ करते हैं.
उन्होंने जब माँगी,
तो उनके इश्क में हमने भी दे दी जान,
पर वो आज तक न सके,
कभी मेरे प्यार को पहचान...
मेरी मौत को वो भूल गए, एक दुर्घटना समझ कर.
और मेरे साथ को वो भूल गए, शायद एक बुरा सपना समझ कर.
तभी तो आज मेरी मुहब्बत ही मुझ पर हँस रही है
जैसे कोई नागिन, फन फैलाये मुझे डस रही है.
अब उनको कैसे मैं कह दूँ, "बेवफा"
जब मेरी किस्मत ने ही न की कभी मुझसे कोई वफ़ा ?
इसलिए ऐ सनम !
आज मैं तुझको माफ़ करता हूँ...
तुझे न मिले कभी ऐसा कोई धोखा,
यही खुदा से आज मैं फरियाद करता हूँ...
महेश बारमाटे "माही"
27th Oct. 2007
सोमवार, 25 अप्रैल 2011
वादा...
निभाने का ये वादा,
आप करेंगे हमको याद जब - जब".
मुझको लगा उनकी ये बात, मेरी तकदीर बन गई.
मेरे दिल में भी उनकी एक सुन्दर तस्वीर बन गई.
पर न आये वो और न आया उनका कोई ख़त.
इतना होने के बाद भी, ये दिल कहता है के "रो मत".
क्योंकि मैं भूल गया था कि
"कुछ लोगों के लिए,
वादा तो बस वादा होता है.
इसमें उनके लिए सच कम
और झूठ ज्यादा होता है".
अब कहता हूँ दुनिया वालों से के
"करना न कभी किसी से तुम ऐसा वादा,
जिससे मिले ख़ुशी तुमको चाहे कम,
पर दर्द होगा उसको ज्यादा"...
महेश बारमाटे (माही)
१३ मई २००७
रविवार, 6 मार्च 2011
कुछ पता ही न चला...
कुछ पता ही न चला...
जाने कब तुम मेरी यादों में छा गए,
कुछ पता ही न चला...
जाने कब तुम मेरे अरमानों में समां गए,
कुछ पता ही न चला...
जाने कब तुम मेरे सपनों में छा गए,
कुछ पता ही न चला...
जाने कब मेरी आँखों में तुम्हारी तस्वीर बन गई,
कुछ पता ही न चला...
जाने कब तुम मेरी तकदीर बन गई,
कुछ पता ही न चला...
जाने कब तुम मेरी बातों में आते चले गए,
कुछ पता ही न चला...
जाने कब तुम मेरी रग - रग में समाते चले गए,
कुछ पता ही न चला...
जाने क्यों मैं तुम्हारा इंतजार करने लगा,
कुछ पता ही न चला...
जाने कैसे मैं तुमसे प्यार करने लगा,
कुछ पता ही न चला...
जाने कैसे मेरा तुमसे इकरार हो गया,
कुछ पता ही न चला...
जाने कब मुझे तुमपे ऐतबार हो गया,
कुछ पता ही न चला...
पर जब मैंने ये जाना,
तब तक बहुत देर हो चुकी थी...
मैंने चाह था तुमको सब कुछ बताना,
पर मेरी किस्मत सो चुकी थी...
मैं तो तुम्हारा ही था,
सदा के लिए,
और चाहा था तुम्हे भी अपना बनाना,
पर तब तक,
तू मुझसे,
बहुत देर हो चुकी थी...
मैंने चाहा था,
तेरे लिए इक सपना सजाना,
पर तब तक तुम,
किसी और की आँखों का
नूर हो चुकी थी...
वो रात, वो तन्हाई का आलम,
जाने कब फिर मेरी जिंदगी बन गया,
कुछ पता ही न चला...
तू क्या गई,
मेरी सारी दुनिया, मेरा सारा जहाँ
मुझसे जाने कैसे रूठ गया
कुछ पता ही न चला...
आज तड़प रहा है "माही",
के तेरी यादों का समुन्दर ख़त्म ही नहीं है होता...
और इंतज़ार में तेरे
ऐ माही !
ये दिल न जाने कब कब रोता है ?
ये भी मुझे कभी पता ही न चला...
सच में...
कुछ पता ही न चला...
महेश बारमाटे "माही"
6th March 2011
11:54pm
सोमवार, 21 फ़रवरी 2011
कवि हो गया हूँ मैं...
जो कभी न सोचा था, वही हो गया हूँ मैं...
लेखक बनने की तमन्ना थी, पर कवि हो गया हूँ मैं...
कुछ सोचते - सोचते, कहीं खो गया हूँ मैं...
चाँद छूने की तमन्ना थी, पर रवि हो गया हूँ मैं...
ज़िन्दगी में कुछ पाने की तमन्ना सबकी होती है,
और संसार में हर किसी की किस्मत कभी जागती, कभी सोती है...
मैंने भी अपनी सोती किस्मत को जगाना चाहा,
आसमाँ से एक तारा तोड़कर, अपना घर भी सजाना चाहा...
इसीलिए लिखने की मैंने भी शुरुआत कर ली...
मंजिल को पाने के लिए, अपनी किस्मत से मैंने भी मुलाकात कर ली...
पर जब किस्मत ने न मानी मेरी बात,
के मैं करूँगा मेहनत, अब चाहे दिन हो या रात,
बन के दिखाऊंगा, कवि और लेखक एक साथ...
इसलिए आज किसी की नज़र में हूँ मैं लेखक,
तो किसी के लिए कवि हो गया हूँ मैं...
अपने चाहने वालों के मन में,
सुनहरी छवि हो गया हूँ मैं...
बनना चाहता था मैं लेखक,
और साथ में कवि हो गया हूँ मैं...
चाँद छूने की तमन्ना थी, पर रवि हो गया हूँ मैं...
जो कभी न सोचा था, वही हो गया हूँ मैं...
कवि हो गया हूँ मैं...
कवि हो गया हूँ मैं...
By
Mahesh Barmate (माही)
21st Aug. 2007
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