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रविवार, 20 जून 2021

मुझे बेवफा न समझ..


तेरी सोच का मैं गुमान हूँ
मुझे इश्क़ की बहार न समझ।
मैं मजबूरियों में जो चला गया
मुझे बेवफा न समझ।

किसी दिन वापस आऊँगा
मुझे कल की बात न समझ।
मुझे समय पर है यक़ीन
मुझे वस्ल-ए-रात न समझ।

मेरी गुमनामियाँ तुझसे ही हैं
जो तू न मिला तो मैं क्या रहा
लिख रहा हूँ आज भी एक खत
मुझे डाकिया न समझ।

क्या पता, है ये क्या लिखा
मैं अनपढ़, मैंने कुछ न सीखा।
मेरे हाथ बस चलते रहे
कलम को नागवार न समझ।

थोड़ी तवज्जोह में खुश हो लूँ मैं भी
अगर वो तेरी तरफ से हो..।
दिल का कोना-कोना धड़कता है अब भी तेरे ही लिए
मुझे कोई ग़ैर यार न समझ..।

- महेश "माही"

बुधवार, 9 मई 2018

मेरे गाँव वाले घर में..



छोटे - छोटे दरवाजे

मोटी - मोटी दीवारें थीं

मेरे गाँव वाले घर में

न किसी के दिल में दरारें थीं।


बड़े छोटे से कमरे में

पूरा परिवार रहता था

सुख - दुख के सारे मौसम

हर कोई संग सहता था।


पुरानी एक तश्वीर टंगी थी

पुरखों वाले कोने में

डर का कोई सवाल नहीं था

घुप्प अँधेरों में सोने में।


नीम की छाँव में बीते शामें

दादी - नानी की कहानियों में सदियों के कारनामे 

बीत जाता था पूरा साल

पहन के चंद फटे पायजामें।


छोटी सी खुशी में भी

पूरा गाँव खुश होता था

ग़म की अगर खबर मिले तो

पूरा गाँव संग हमारे रोता था।


आधुनिकता की भागदौड़ में

वो छोटा दर-ओ-दरवाजा टूट गया

जानें कहाँ गया वो जीवन माही!

लगे जैसे भगवान हमसे रुठ गया..।


- महेश बारमाटे "माही"

7 मई 2018

गुरुवार, 29 मार्च 2018

मौन..

सुनों..!

एक "मौन" सी कहानी है

कुछ खामोशियाँ हैं मेरे जेहन में

जो चीखती हैं

बिन आवाज के..।

देखो!

आज कागज पे रख ही दिया मैंने

अपने अंदर के उस "मौन" को

के कहीं गुम न जाये

इसीलिए

शब्दों में पिरो के..।

पढ़ो!

आज तुम इस "मौन" को

के शायद ये शब्द भी छू लें

तुम्हारे दिल के तारों को..।

फिर देखना..

मेरी खामोशियों की

मूक ज़ुबाँ

कागजों पे बिखरे

शब्दों के मोती से

कैसे एक नया राग

तुम्हारे दिल के तारों से

निकलेगा संगीत बन के..

और फिर

खो जाओगे तुम

मेरे उसी "मौन" में

जो तुम्हें कल तक

पसंद भी न था माही..!


- महेश बारमाटे "माही"

29/03/18

शुक्रवार, 16 मार्च 2018

क्यों तुम्हें हमेशा...


हर पल तेरा चेहरा

मेरे जेहन के समंदर में उतराता रहता है..

और तेरा ख्याल

जैसे हो कोई चाँद

डूब के मुझमें

गोते खाता रहता है..

तुम लाख चाहो के मुझे भुला दो

पर ये जो इश्क़ है न मेरा

तेरे दिल की बगिया में गुल

खिलाता रहता है।

यकीन न हो

तो तुम ही बता दो

क्यों तुम्हे भी हर हमेशा

मेरा ही ख्याल

आता रहता है..?

कहो..?

क्यों तुम्हें हमेशा...


- महेश बारमाटे "माही"


शनिवार, 13 सितंबर 2014

कब ?

कब रोका था मैंने तुझे माही!
मेरी ज़िंदगी में आने से
और दिल तोड़ कर फिर जाने से...

मुझे अपना बनाने से
मुझे पलकों में छुपाने से
मेरी दुनिया में आ के
कुछ देर रुक के
मुझे यूं ही सताने से

सता के
मुहब्बत में
फिर रूठ जाने से
रूठ के बस यूं ही मुझसे
फिर दूर जाने से
कब रोका था मैंने तुझे
ज़िंदगी को मेरी
छीन कर ले जाने से
और मौत को भी
मुझसे दूर ले जाने से

दूर ले जा के
तन्हाइयों को भी
मुझसे खफा करवाने से
न चाहते हुये भी
एक बार फिर
मुझसे कोई खता करवाने से

कब रोका था मैंने तुझे माही!
मेरी ज़िंदगी में आने से
और दिल तोड़ कर फिर जाने से...

- महेश बारमाटे "माही"