सोमवार, 15 दिसंबर 2014

तेरे रंग में रंग दे...



मुझपे रंग अपना, कुछ ऐसा लगा माही!
के अब कोई दूजा रंग मुझपे दिखे नहीं।

उतर जाएँ सारे रंग पुराने
के अब कोई दूजा रंग मुझपे बचे नहीं।

ऐसे सजूं कुछ अब मैं तेरे रंग से
के अब कोई दूजा रंग मुझपे सजे नहीं।

जहाँ भी जाऊं बस तुझको ही मांगू
के चाहत अब कोई मुझ में बचे नहीं।

कर दे रंगीन ये दुनिया मेरी
के हाथों पे कोई दूजी महंदी रचे नहीं।

आजा तेरे रंग में रंग जाऊं अब मैं कुछ ऐसे
के दुनिया का कोई रंग मुझपे अब बचे नहीं।

- महेश बारमाटे "माही"

मंगलवार, 9 दिसंबर 2014

तुमसा कोई नहीं..

काश!
तुझसा कोई दूसरा पाना
इतना आसान होता।

जो हर सुबह मुझे
ख्वाबों में आकर
मुझे नींद से जागने न दे।

गर खुल भी जाए
नींद सुबह तो
ख्याल उसका
होंठों से मुस्कान भागने न दे।

तभी कॉल आये उसका
और गुड मॉर्निंग सुनाई दे
दिन भर हर जगह
उसका ही चेहरा दिखाई दे।

शाम को कॉल आये
और वो पूछे मुझे
कि आज कुछ नया लिखा क्या?
जिंदगी से अपनी
कुछ नया सीखा क्या?

रूठ के जो मुझसे
वो 3 - 4 कवितायेँ लिखवा ले।
और जबरन ही वो मुझसे
मेरे सारे राज़ खुलवा ले।

जो मेरी हर कविता को
सबसे पहले सुने, पढ़े और झूमे
और हर एक पुरानी कविता को मेरी
रक्खे याद और अपने लबों से चूमे।

कभी कभी यूँ रूठे
कि अपनी हर बात मनवा ले
पर न माने एक भी बात मेरी
और बेवजह ही मुझे
खरी - खोटी सुना दे।

और भी हैं ऐसी बहुत सी बातें तुझमे
जो किसी और में न मिलेंगी कभी
काश! तुम ये भी समझ पाते माही!
"मुझसा कोई दूसरा ढूंढ लो"
ये न तुम कभी कहते कभी..।

- महेश बारमाटे "माही"

रविवार, 12 अक्तूबर 2014

चल आज.. बड्डे मनाते हैं।


चल आज..
बड्डे मनाते हैं।

खो गए हैं वक़्त की धुंध में जो दोस्त
आज उन्हें ढूँढ के लाते हैं।

चल आज..
बड्डे मनाते हैं।

चंद खुशियाँ भी खो गई हैं संग उनके
चल वो भी बंटोर के लाते हैं।

चल आज..
बड्डे मनाते हैं।

वो मम्मी के हाथ से बना केक
वो पापा के दिए नए कपड़े और खिलौने
बड़े भाई-बहनों के हाथों से मिठाइयाँ खाते हैं।
चल आज..
बड्डे मनाते हैं।

फिर सजेगा आज कमरा मेरा
फिर लगेंगे आज गुब्बारे
एक बड़े गुब्बारे में भैया से टाफियाँ भरवाते हैं
चल आज..
बड्डे मनाते हैं।

कुछ खेल और नाच - गाना होगा
ये दिल फिर दोस्तों के गिफ्ट्स का दीवाना होगा
सारे दोस्त, एक - एक कर सब गुब्बारे फोड़ जाते हैं
चल आज..
बड्डे मनाते हैं।

वो मोहल्ले भर में बाँटते हम खुशियाँ
और हम दोस्तों की वो रंगरलियाँ
चल हर गली, अपने बड्डे का शोर मचाते हैं
चल आज..
बड्डे मनाते हैं।

इस काम काज की भाग - दौड़ में
पैसे कमाने की झूठी होड़ में
वो भूली बिसरी कहानियाँ
चल आज सुनते और सुनाते हैं
चल आज..
बड्डे मनाते हैं।

ज्यादा नहीं, बस चार दोस्तों को बुलाते हैं
जुदाइयों से भरी, किस्मत से आज लड़ जाते हैं
एक दिन के लिए, ज़िन्दगी को वापस बुलाते हैं
और ज़िन्दगी के पेड़ से, बचपन की यादें तोड़ लाते हैं।

चल न यार..!
आज बड्डे मनाते हैं।

- महेश बारमाटे "माही"

बुधवार, 8 अक्तूबर 2014

वो पहली बार...



तुम एक सपने में आई थी
सपना छोटा सा था
और तुम मुस्कुराई थी
एक कोई दोस्त भी था साथ तुम्हारे
और मेरे दोस्तों ने महफ़िल जमाई थी।

बैठी थी तुम मुझसे चिपक के
और हर बात पे अपनी मौजूदगी जताई थी।

कुछ शरारतें की
थोड़ी बहुत बातें की
तुम्हारी शरारतों पे कुछ
हिदायतें मैंने भी समझाई थी।

फिर भी तुम्हें कोई भी
बात समझ में न आई थी।
आज पहली बार
हाँ! शायद पहली बार तुम
सपने में आई थी।

अचानक ही टूटा सपना
और आँख खुल गई
खुलते ही आँख
ख़ुशी के आंसुओं से भर आई थी।

क्योंकि आज तुम्हारी शरारतें
मुझे सचमुच भायी थी
पहली बार माही!
तुम सपने में आई थी।

-महेश बारमाटे "माही"

रविवार, 5 अक्तूबर 2014

आज जरा जी लेने दे मुझे...


आ भर लूँ बांहों में तुझे
कि आज जी लेने दे मुझे।

ये तरसती निगाहें
और खुली मेरी बाहें
तू इन धड़कनों की प्यास है
क्या कहती हैं धड़कने तेरी
आज सुनने दे मुझे।

मेरी प्यास है तू
एक अन्जाना एहसास है तू
लिखा है नाम मेरा
हाथों की लकीरों में तेरी
एक बार फिर पढ़ने दे मुझे।

ये लबों की सुर्खी मेरी
बस तेरे नाम से है माही!
है इश्क़ तुझसे
कि आज लबों को लबों से
छू लेने दे मुझे।

आज जरा जी लेने दे मुझे...।

-महेश बारमाटे "माही"

शनिवार, 13 सितंबर 2014

कब ?

कब रोका था मैंने तुझे माही!
मेरी ज़िंदगी में आने से
और दिल तोड़ कर फिर जाने से...

मुझे अपना बनाने से
मुझे पलकों में छुपाने से
मेरी दुनिया में आ के
कुछ देर रुक के
मुझे यूं ही सताने से

सता के
मुहब्बत में
फिर रूठ जाने से
रूठ के बस यूं ही मुझसे
फिर दूर जाने से
कब रोका था मैंने तुझे
ज़िंदगी को मेरी
छीन कर ले जाने से
और मौत को भी
मुझसे दूर ले जाने से

दूर ले जा के
तन्हाइयों को भी
मुझसे खफा करवाने से
न चाहते हुये भी
एक बार फिर
मुझसे कोई खता करवाने से

कब रोका था मैंने तुझे माही!
मेरी ज़िंदगी में आने से
और दिल तोड़ कर फिर जाने से...

- महेश बारमाटे "माही"

शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

कभी कभी तू यूं ही...

कभी कभी तू यूं ही दिख जाता है
तस्वीरों में मुझको
पर ऐ खुदा!
क्यूँ नहीं मिलता वो
मेरी तक़दीरों में मुझको।

कोई तो खता की होगी
गए जनम में हमने
के हर पल पाता हूँ
जंजीरों में खुद को।

प्यार देने आया हूँ
प्यार ही देना चाहता हूँ
पर जाने हो गई है
आज नफरत क्यूँ तुझको।

चल जी लें एक बार फिर
बन के अजनबी माही!
के वो मिलाता है हर बार ही
अजनबियों से मुझको।

- महेश बारमाटे “माही”

बुधवार, 13 अगस्त 2014

तुम थे वहाँ...

तुम थे वहाँ
करते मेरा इंतज़ार
बैठ बिस्तर के कोने में
था मेरे आने का एतबार।

जाने कितनी देर
बैठे थे तुम वहाँ
मैंने की देर
गर्म मौसम में जैसे सर्द हवा।

हाँ! गलती थी मेरी
कि मैं न आया
किया इंतज़ार तुमने
और मैं पछताया।

पर क्या करता मैं
तुम जो हो खफा मुझसे
करनी नहीं है बात तुम्हे
और चाहते हो वफ़ा मुझसे।

तेरे होने का एहसास मुझे
तेरे और करीब ले आता है
तेरी मौजूदगी बताती है
कि ये एहसास तुझे
कितना तड़पाता है।

न तड़प
आ बाँहों में भर मुझे
एक पल को हो के मेरा
एक नगीना सा
दिल के ताज पे जड़ मुझे।

आ मेरा हो जा
मुझमे आज तू खो जा
ख्वाबों में सोया है अक्सर
आ खो के मुझमे तू सो जा।

कर ख़त्म इंतजार को अब
बरसा मुझपे अपने प्यार को अब
बिता दे सारी ज़िन्दगानी अपनी माही!
इस पल में पूरा कर अपने एतबार को अब।

महेश बारमाटे "माही"

रविवार, 10 अगस्त 2014

पराया..

क्या चाहूँ
और क्या हो जाता है,
जिसे चाहूँ
वो पराया हो जाता है।

इश्क़ की आबो-हवा
मेरी महफ़िल में न थी कभी
जीता रहता हूँ ग़लतफ़हमी में अक्सर
करीब जाऊं तो दिलबर मेरा
बस एक साया हो जाता है।

समझ भी न पाया कभी
और जान भी न पाया कभी
ये इश्क़ है या और कुछ
इक पल में ही किया धरा
सब जाया हो जाता है।

या रब!
बहुत देखी तेरी खुदाई
मिला के क्यूँ दी ये जुदाई
कोई अब तक न अपना सका इस दिल को माही!
और हमेशा ये दिल ही क्यूँ पराया हो जाता है।

- महेश बारमाटे "माही"

बुधवार, 6 अगस्त 2014

यकीन नहीं होता...

यकीन नहीं होता
कि तू अब मुझसे दूर चली गई है
कि जाते - जाते तू मुझसे भी
मशहूर हो गई है।

तुझे पाने की चाहत थी
अपना बनाने की चाहत थी
कुछ – कुछ तेरी भी हसरत थी
के तुझे भी मुझसे मुहब्बत थी।

मुहब्बत थी ऐसे
के एक दूजे का होना था
खो कर तेरी बांहों में
बस तुझमें ही खोना था

हो कर बस तेरा
तुझमें एक दुनिया बसाना था,
और उस दुनिया में माही!
मुझे तो बस तेरा हो जाना था।

पर शायद
किस्मत को अपनी
ये मंजूर न था
हालात तो थे
पर मैं मजबूर न था

मजबूरी थी तेरी
मजबूरी थी मेरी
दिलों के दरमियान
न ये दूरी थी मेरी
न ये दूरी थी तेरी।

फिर भी हम
बिना मुलाक़ात के ज़ुदा हो गए
तुम कुछ यूं रूठे मुझसे
के बिना बात के खफा हो गए।

हम एक हो सकते थे शायद
जैसे हर रोज हुआ करते थे
दूरियाँ मायने नहीं रखती थी
के ये दिल रोज मिला करते थे।

खैर! जो हुआ
सो हुआ
आज भी तेरी तस्वीर निहारता हूँ।
तू खफा है
मेरी भी यह सजा है
के तुझे हर घड़ी पुकारता हूँ।

यकीन नहीं होता
अब भी
के तू मुझसे दूर चली गई है
तेरी तस्वीर है बातें करती मुझसे
के किस्मत तो कहीं मेरी
छली गई है।

तू रहे जहाँ
बस खुश रहे
अश्क-ए-दिल से भी तुझे दुआ देता हूाँ
कतरा – कतरा तुझे याद करता है माही!
हर रोज अश्कों का समुंदर मैं
बस तेरी याद में यूं ही पीता हूँ।

- महेश बारमाटे “माही”

शुक्रवार, 27 जून 2014

जवाब-ए-ख़त...

मत भेज अब मेरे जवाब-ए-ख़त माही!
के तेरे इंतज़ार में, मैं भी अपना पता भूल बैठा हूँ...

दिन भूल बैठा हूँ
शाम भूल बैठा हूँ
जो रूठा था मैं तुझसे
वो खता भूल बैठा हूँ।

लिखता रहता था
ख़त तेरी याद में
आज मैं अपना ही
फलसफ़ा भूल बैठा हूँ...

अब तू मिल जाये
तेरी किस्मत होगी
कभी सुना था फरिस्तों से
वो किस्मत का लिखा भूल बैठा हूँ।

जा रहा हूँ अब मैं
मीलों दूर तेरी दुनिया से
तुझे जो बनायी मंज़िल अपनी
तो हर रस्ता भूल बैठा हूँ।

क्या लिखना था तेरे लिए
और क्या लिख बैठा हूँ
मैं तो तेरे इश्क़ में माही!
खुद का खुद से रिश्ता भूल बैठा हूँ...।

- महेश बारमाटे "माही"

गुरुवार, 26 जून 2014

कहानी तेरे नाम की...

लिखी थी कहानी तेरे नाम की
मुझमे थी ज़िंदगानी तेरे नाम की

हवा में ठंडक, फिजा में रंगत
और चुनरी थी धानी तेरे नाम की

गुलों में गुलाब, मयखाने में शराब
साकी भी थी दीवानी तेरे नाम की

पुकारता चला था मैं, हर गली, हर शहर
लबों पे थी कहानी तेरे नाम की

एक कहानी, तू पगली दीवानी
मेरी भी एक थी रानी तेरे नाम की

सूखी स्याही, पन्नों पे फैला अश्कों का पानी
खो गई मुझसे, ये ज़िंदगानी तेरे नाम की

अब जो जी रहा हूँ
तेरे इंतज़ार में माही!
आ पूरी करें
फिर ये कहानी तेरे नाम की

लिखी थी जो
कहानी तेरे नाम की
तुझ बिन अधूरी है
मेरी ज़िंदगानी तेरे नाम की...

- महेश बारमाटे “माही”

(Photo Courtesy : images.google.com)

शनिवार, 21 जून 2014

दिल के किसी कोने में...

दिल के किसी कोने में
एक दर्द छुपा रखा है
अपनी तन्हाइयों को मैंने
खुद से बचा रखा है...

जाने किस दर्द की
दवा बन के तू आया था
के तेरा ग़म भी मैंने
अपने इस दर्द-ए-दिल से बचा रखा है।

रोता है दिल
तन्हाइयों में अक्सर
की थी जो दुआ - खुशी की तेरी
इसीलिए इन अश्कों को मैंने
आँखों में जमा रखा है...

एक नदी सी थमी है
कुछ - कुछ बर्फ भी जमी है
सैलाब है कोई तेज़ाबों का
आज अपना हर दर्द जला रखा है ।

वो तो लिख गया कहानी मेरी
बरसों पहले "माही"
आज जाना के क्यों दिल ने खुद को
दर्द का कब्रिस्तान बना रखा है।

- महेश बारमाटे "माही"

बुधवार, 4 जून 2014

यकीन...

तू ज़िंदगी भर बस मुझे ही चाहेगा माही!
ये यकीन, तू ने मुझे हर ख़्वाब में दिलाया है।

जाने कितनी कवितायें, 
ग़ज़ल, 
शेरों-शायरियाँ
लिखने के बाद ही 
मैंने तुझे पाया है।

दूरियाँ, 
रिश्तों पे कभी भारी पड़ भी गई तो क्या ?
तू तो बस मेरा,
हाँ!
बस मेरा सरमाया है।

रब जाने के क्या हकीकत होगी,
तेरी – मेरी कहानी की ?
मैं रहूँ, न रहूँ, पर तेरे दिल में रहूँगा सदा,
ये यकीन, तू ने ही मुझे दिलाया है।

किसी अधूरी कहानी से
ये अल्फ़ाज़ मेरे
ये कहानी करेंगे बयां,
के तू ने ही जीता है माही!
और तू ने ही मुझे हराया है।

- महेश बारमाटे “माही”

रविवार, 1 जून 2014

ज़िंदगी के मायने...

ज़िंदगी के मायने 
ज़िंदगी भर ढूंढते रहेंगे
अगर तुझे खो दिया
तो जाने कहाँ ढूंढते रहेंगे।

अब दीदार की तमन्ना है
इक मुलाकात की तमन्ना है।
तू अगर किसी और का हो गया
तो खुद को हम कोसते रहेंगे।

तुझे पाने की ख़्वाहिश नहीं
अपना बनाने की ख्वाहिश नहीं,
बस तुझमे समाना है,
अगर बिखर गया तो
फिर खुद को कहाँ खोजते रहेंगे।

एक बार आ
मुझ में समा जा
बसा के मन मंदिर में माही!
तुझे हर वक़्त
पूजते रहेंगे।

- महेश बारमाटे "माही"

बुधवार, 28 मई 2014

मेरी हकीकत...


जो छुपा ही नहीं
उसे कैसे करूँ उजागर
मेरी हकीकत
आ जान ले तू
एक बार मेरे करीब आकर।

के मेरी कहानी
एक खुली किताब
जिसमें हैं कुछ भेद
और कुछ राज़
बेहिसाब ।

हर पन्ने की हकीकत को
जरा नजदीक से तू पढ़
और फिर जो है सच्ची कहानी
तू अपनी जुबानी
ख्वाबों में तू गढ़।

तेरी रूह का नूर
और मेरा गुरूर
जैसे मैं कोई कतरा
और तू जन्नत की हूर।

बस है आज
जुबां पे मेरे
मेरी कहानी
हँसते लबों के बीच
जैसे
अश्कों का बहता पानी।

पानी में है एक नैया
खोती जा रही है ऐसे
क्षितिज पे मिल रहे हों
जमीन-ओ-आसमां जैसे।

अब कहाँ है जमीन
और आसमां मेरा
तू खुद ढूँढ
कौन था मैं
और क्या हूँ तेरा।

एक अक्स
एक एहसास
तुझसे बहुत दूर
फिर भी हूँ
तेरे पास।

पास इतना
के तुझे मुझ पे एतबार नहीं
और दूर हूँ
के मैं तेरा प्यार नहीं।

फिर भी एक इल्तिजा है
के जान मुझे
आ जा
और करीब से पहचान मुझे।

कर दे उजागर
मेरी हकीकत
परिंदे सी क़ैद ज़िंदगी
फ़ना कर
मेरी शिद्दत।

हर बार की तरह
फिर एक बार
मेरा हो जा
ओ मेरे माही!
रास्तों को बदल
थोड़ा मेरी तरफ भी तो चल
बस कुछ पल
बन के मेरा
बस मेरा
हमराही...।

- महेश बारमाटे "माही"

गुरुवार, 15 मई 2014

किसके लिए ?


दिल करता है आज जरा रो लूँ
पर किसके लिए ?
ज़िंदगी भर के पाप आज
अश्कों की बारिश में धो लूँ
पर किसके लिए ?

मेरा दर्द – ओ – दवा बस तू है,
अब कुछ महसूस करूँ भी तो किसके लिए ?

तू जानता है मेरे हर मर्ज की दवा
आज मैं बीमार पड़ूँ भी तो किसके लिए ?

इश्क़ – ओ – ग़म आज दोनों हैं मुझे तुझसे
इज़हार करूँ भी तो किसके लिए ?

मेरा दिल, मेरी जां
सब तेरे नाम कर दिया है माही!
आज तुझे मैं प्यार करूँ भी तो
किसके लिए ???

- महेश बारमाटे "माही"

सोमवार, 5 मई 2014

मैं...

तेरे इश्क़ की
आवाजें सुनता मैं। 
अब हर पल
तेरी धड़कनों से
बातें करता मैं ।

कभी इस जहां, कभी उस जहां
कभी दरिया तो कभी सहरा
बस तुझे ही ढूँढता फिरता मैं।

जी रहा हूँ इस कदर
दर-ब-दर, दर-ब-दर
हर गली हर शहर
तेरे ही नगमें गाता मैं।

ज़िंदगी एक ख्वाब हो
या सफर...
जुदा हो के भी
बस तुझमे समाता मैं।

तेरी कहानी
का हर लफ्ज
मेरी आँखों से पढ़ ले
के हर किस्से में
खुद में ही खोता जाता मैं।

आज मुझमे और तुझमे
क्या फर्क है बचा माही!
कभी तू मुझमे
कभी तुझमे समाता मैं।


- महेश बारमाटे "माही"

शुक्रवार, 2 मई 2014

मजबूरियाँ

कुछ वर्ष पहले, जब मैंने लिखना शुरू किया था, बस उनही दिनों की यादों को याद करता मैं, आज अपनी डायरी पढ़ रहा था, तो एक अनमोल नगीना मिला। सोचा कि कुछ छोटे - छोटे फेर बदल के बाद आपके साथ साझा कर लूँ। 


मिल के भी मिल न सके हम
जाने वो क्या मजबूरी थी?
फासले तब हो चुके थे सारे कम,
पर जाने कैसी दूरी थी?

तेरी एक चहक से
महक उठा था मेरा सारा आलम
तब जिसने भी देखा
तुझे देना चाहता था अपना मन
तुझमे जाने कैसी जादूगरी थी?

सोचा था,
इज़हार करूंगा मैं तुझसे
जब हल्की सी धूप खिली थी।
सारा जहां महक रहा था उस पल,
फिजा में बस तेरी महक घुली थी।

हमारे इश्क़ को शायद
लग गई थी किसी की नज़र
जिससे हम थे जाने क्यों बेखबर?
समय पर मैं आ न सका
और तुझे पा न सका,
मेरी भी जाने ये कैसी मजबूरी थी?

मेरी आँखों के सामने
तू किसी और की हो गई
ऐसा लगा जैसे मेरी किस्मत
एक बार फिर सो गई,
पर बिन तेरे ये ज़िंदगी
अब भी अधूरी थी।

फिर भी आज बिन तेरे जी रहा हूँ मैं
ग़म – ए- जुदाई घुट – घुट के पी रहा हूँ मैं।
हमारे दरमियाँ पहले कभी न इतनी दूरी थी...

बहार में भी हमारे प्यार का गुल खिल न सका
उसकी भी कोई न कोई तो मजबूरी थी।
हम मिल के भी मिल न सके
तेरे – मेरी माही!
जाने क्या मजबूरी थी...?

- महेश बारमाटे "माही"

बुधवार, 30 अप्रैल 2014

वो मुझसे प्यार करने लगे हैं...

वो मेरा इंतज़ार करने लगे हैं
कुछ – कुछ मुझसे इक़रार करने लगे हैं
यूं तो कभी न हुई कोई मुलाक़ात हमारी
पर अब वो ख्वाबों में मेरा दीदार करने लगे हैं।

बस जानते हैं
एक – दूजे को हम,
पर पूरी तरह से नहीं।
फिर भी मेरी अनजान शख्सियत पे
वो अब एतबार करने लगे हैं

मेरी पसंद – न – पसंद तो
रब जानता है मेरा।
पर अपनी पसंद का वो अब
सारे – आम इज़हार करने लगे हैं।

हर पल बदलती अदा ये उनकी
मेरी सोच मे दस्तक देती है
के अब क्या कहूँ इसे मैं माही!
क्या वो मुझसे प्यार...
करने लगे हैं ???

- महेश बारमाटे "माही"

गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

मेरे माही!


इश्क़ करता है तू
मुझसे मेरे माही!
पर जाने डरता है तू
किस से मेरे माही!

ये चाहत भी अजीब होती है।
हर पल मैं – तेरे और तू – मेरे करीब होती है।
फिर भी जुदा – जुदा सा फिरता है तू
मुझसे मेरे माही!

इश्क़ है तो इज़हार कर
आ इक पल के लिए तो मुझसे प्यार कर।
के जी ले आज उस पल में ज़िंदगी सारी
बिन मेरे जी रहा है तू जिसे मेरे माही!

हम मिले थे
कभी न बिछड़ने के लिए मेरे माही!
तेरी – मेरी भावना के संग
बहने के लिए मेरे माही!
भावनाओं का बहता झरना
किस मोड़ पे ले आया है हमें
के अब ज़िन्दगी तरस रही है,
मरने के लिए मेरे माही!

आ एक बार फिर
एक हो जाते हैं।
इक दूजे की बाहों में
खो जाते हैं।
इस गुजरते लम्हे की कसम है तुझे
के अब के ऐसे मिलें
के फिर न बिछड़ने के लिए मेरे माही!

मेरे माही!
आज भी तू मेरी तलाश में है
दूर ही सही, तू फिर भी मेरे पास में है।
तो फिर क्यूँ जुदा मुझसे होने की ज़िद है तेरी,
कोई खता नहीं, फिर भी सजा देने की ज़िद है तेरी,
के आज मेरा नाम,
तेरे रग – रग के एहसास में है।

- महेश बारमाटे "माही"

शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

मेरा कल...

ऐसा लगता है कि जैसे
कल की ही बात हो

कल ही हम मिले
और कल ही बिछड़ गए

कल ही दिल मिले
कल ही प्यार हुआ

कल ही कल में
इजहार - ओ - इक़रार हुआ

कल ही कल में
कई ज़िंदगियाँ गुजारी
कल ही कल में
खोयी और फिर पायी हमने खुमारी।

कल ही कल में
सातों जनम जी गए
और
कल ही कल में
हम मर गए

कल ही कल
कल ही कल
कल ही कल
जाने क्यूँ नही बीतता आज
मेरा वो... बीता हुआ कल?

आज मेरे
उस कल में
बीत गईं सारी खुशियाँ
और सारे ग़म...
सारे रिश्ते - नाते
वो पल
जिनमे हम थे
हँसते - गाते ।

अब क्या है
पास मेरे
ये सोचता हूँ
तो याद आता है मुझे
मेरा कल।

माही!
तू उस पल से इस पल तक
मेरे कल से, मेरे कल तक
आज भी है साथ मेरे
यादों में, बाहों में
नज़रों में, निगाहों में
शामिल है
मेरे काबिल है
जैसे हो
तू मेरा आज
और
तू ही मेरा कल...


- महेश बारमाटे "माही"

गुरुवार, 27 मार्च 2014

चार दिन की ज़िंदगी ...

चार दिन की ज़िंदगी बची है अब मेरे लिए
फिर जाने क्या समा होगा
आ भर ले फिर बाँहों में मुझे कुछ पल के लिए
फिर कहाँ प्यार का मौसम जवां होगा...

कुछ पल बैठ सामने मेरे
डूब जाने दे इन झील सी आँखों में मुझको
के मौत करीब है अब तो मेरे
फिर कहाँ तेरी आँखों का किनारा होगा ?

कुछ बात कर
आज सुबह से रात कर
ले चल चाँद - तारों के बीच मुझे
के फिर कहाँ सितारों भरा ये आसमान होगा।

मेरी ज़िंदगी के चार दिन
अब न बीते ये तेरे बिन
बस तेरी ख़्वाहिश है माही!
इसे पूरा कर
फिर कहाँ तेरी बाहों का सहारा होगा...

- महेश बारमाटे "माही"

बुधवार, 29 जनवरी 2014

इश्क़

तुम तो गाड़ी से आ रहे थे,
और हम पैदल ही जा रहे थे...

जानूँ न क्यों तुमने,
हमको था फिर यूँ ठोका
के अब तो हमे भी दिन में 
तारे नज़र आ रहे थे। 

सामने की गाड़ी ने भी 
ब्रेक से था खुद को रोका 
पर वो तो था दिमाग से पागल,
ब्रेक की जगह वो तो,
एक्सिलीरेटर दबा रहे थे...

हमारी तो गलती थी इतनी,
के हम तो रोड किनारे से जा रहे थे,
और पीछे की गाड़ी में साहब,
मेमसाब से इश्क़ फ़रमा रहे थे। 

अब तो टूटी थी हड्डी
और हम दर्द से कराह रहे थे
और देखने वाले भी हमको 
मंद - मंद मुस्कुरा रहे थे। 

सायरन सुना जब एंबुलेंस का
तो लगा कि अब तो बच ही गए,
पर क्या पता था के अब तो  
यमदूत भी सायरन वाले वाहन में आ रहे थे... 

मरते - मरते हम तो 
जाने क्या - क्या गुनगुना रहे थे
के "मर जाओ तुम कमीनों 
जो रात का मज़ा,
दिन - दहाड़े गाड़ी में लिए जा रहे थे... "


- इंजी॰ महेश बारमाटे "माही"