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गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

पत्थर की हवेली..

पत्थरों पे बनी कारीगरी
देख बीता जमाना याद आया
वो लकड़ी की चौखटें
और भारी दरवाजों पे लटकी
लोहे की मोटी सांकरे
और
मोटे मोटे स्तंभों पे जमी इमारतें
जैसे आवाज दे रही हों
पत्थरों से बनी चिलमनें
के सुन ले ए मुसाफिर!
मेरे दर पे गुजरी आहटें।
कभी गूंजा करती थी
चंहु ओर किलकारी सी
आंगन में सजती थी
नित नए फूलों की फुलवारी सी
खलिहान में लगे नीम के पेड़ तले
चौपाल लगा करती थी
और घर के एक कोने में
गोशाला सजा करती थी।
गिनती में कम थे
पर मेरी खूब सेवा करते थे
मेरी ठंडी छांव में
पीढ़ियां गुजरा करती थी।
मेरे दरवाजों पे घोड़े हाथी
सलाम किया करते थे
मय खाने का भी था एक कमरा
जहां साकी के संग मालिक भी
एक नई ज़िन्दगी जीया करते थे।

अब न जाने कहाँ खो गई
वो किलकारी
वो हंसी ठहाके वाली महफिलें
वो मेहमान नवाजी
और वो बंद पर्दों के पीछे की
मौन चाहतें।
सजावट का अब वो नाम नहीं
जिनसे ये पाषाण दीवारें सजा करती थी
देख के अपनी खूबसूरती माही!
मैं भी इठलाया करती थी।
अब वो मेरा रंग रूप नहीं
न वो साजो-श्रृंगार है
मेरी भव्यता का लोहा
हो गया जंग-सार है।
सच कहूं मैं अपनी कहानी
तो
पहले बस मैं थी पत्थर की
और मेरे मालिक दिलदार थे
अब दिल हो गए पत्थर के
न मेरा नामो-निशान है।

न मेरा नामो-निशान है..

#महेश_माही
13/04/17
1:08  pm

मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012

मैं... आज फिर... लिख रहा हूँ...

आज...
लिख रहा हूँ...
हाँ ! मैं  फिर लिख रहा हूँ...

पर क्यों ?
क्यों छोड़ा था मैंने...
लिखना...?

क्या...?
भूल गया था मैं...
खुद से ही कुछ...
सीखना...?

जाने कितने...
मंज़र बीत गए...
और दिल को कितने...
खंजर चीर गए... ?

फिर भी क्यों...?
हाँ... हाँ क्यों...?
मैं कुछ लिख न पाया...?
देख के कई... सपने...
मैं खुद सपनों सा क्यों,
दिख न पाया... ?

देखो आज फिर,
लिख रहा हूँ...
फिर एक नई शुरुआत करना
सीख रहा हूँ...

हाँ!
हाँ! आज मैं कुछ...
लिख रहा हूँ...

माही !
लिख रहा हूँ न ? ...


इंजी० महेश बारमाटे "माही"
9 Oct 2012
10:35 pm

शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

वो कुछ ख़ास है...

आज बहुत दिनों बाद मेरी कलम से कुछ शब्द दिल की आवाज को बयान करते मिले हैं... उम्मीद है आपको पसंद आएगी...। 

वो कुछ ख़ास है... 

वो दूर है,
और वो पास भी...
वो कुछ नहीं है,
पर वो ख़ास भी...

सोचता हूँ उसे,
और मानता हूँ उसे...
वो अगले कई जन्मों की तलाश है,
और वो एक प्यास भी... 

रोता हूँ उसके लिए,
और हँसता हूँ मैं संग उसके...
उससे इन्कार है मुझे
और उससे प्यार भी...

वो है मेरी ज़िंदगी का हर एक लम्हा,
फिर भी हूँ मैं अब तक तन्हा...
उसकी राहे-मंजिल हूँ मैं,
और वो मेरा साहिल भी...।

हूँ बेवफा मैं, बस उसके लिए...
और निभाई है वफा, शायद बस खुद के लिए...
 तू मेरी जीत का आगाज है माही !
और दिल की हार का साज भी...

तू दूर है...
और पास भी...
तू कुछ नहीं....
पर ख़ास भी...

- महेश बारमाटे "माही"
28 सितंबर 2012

शनिवार, 10 सितंबर 2011

वो... मुझसे पूछा करती थी...

वो हर सुबह मुझसे 
मेरा ख्वाब पूछा करती थी...
कैसा था वो बीती रात का 
बादलों के पीछे छिपता महताब पूछा करती थी...। 

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

ये मेरी किस्मत...


जिसे पाने की उम्मीद पे चला हूँ,
वो मंजिल तो कभी दिखाई ही नहीं देती। 
के हर रहगुज़र बन के मेरा हमसफर,
अक्सर मुझे यूं ही तन्हा छोड़ गया। 

पर फिर भी जाने किस उम्मीद में जी रहा हूँ,
के कभी तो मंज़िल को पा ही लूँगा। 
और वो भी फिर आएगा एक बार फिर पास मेरे,
जो पिछली दफ़ा मुझसे था मुंह मोड़ गया। 

आज आसमाँ से गिरी एक बूंद भी मुझको,
तूफाँ की तरह भिगो गई, 
लगा के जैसे मंद हवा का इक हल्का सा झोंका,
भी मुझे झँझोड़ गया। 

जाने कितने जतन किए होंगे मैंने, 
इन लबों को फिर खुशी देने के वास्ते...
पर किस्मत का हर ज़र्रा हर बार मेरा,
हर करम निचोड़ गया...। 

फिर भी आज बैठा हूँ मैं इसी आस मे,
के लगता है मंज़िल अब भी यहीं कहीं है मेरे पास में।
और कह रहा है कोई इस दिल से,
के एक नज़र फिर देख इधर ओ मेरे "माही"!
वो जाता "लम्हा" भी किस्मत का फिर एक नया, दरवाजा खोल गया। 

महेश बारमाटे "माही"
19 जुलाई 2011
4.32 pm

मंगलवार, 12 जुलाई 2011

वह, उसकी यादें... और... मैं...

उसे क्यों याद करूँ जो कभी मेरी थी ही नहीं...
ऐ खुदा ! बस एक इल्तिजा है मेरी 
के खुश रखना सदा उसे जिसने मुझे खुश होना सिखाया 
जिसने मेरे गीतों को अपने होंठों से था लगाया 
और जिसने मेरे दिल को एक बार फिर धड़कना था सिखाया...

आज वो जहाँ भी है, शायद खुश है
तो क्यों उसे अपनी मौजूदगी का एहसास दिलाऊं ?
ऐ चाँद ! जा तू उसे रातों को मीठी नींद में सुलाना...
ऐ फलक के तारों ! जाओ तुम उसका आँचल बन जाओ...

जाओ सारी खुशियाँ भर दो झोली में उसकी...
के मेरा जिक्र भी उसे छू न पाए...
मेरे अक्स की परछाई भी उसे याद न आये कभी...
के वो तो चली गई है बिना मुझसे कुछ कहे...
तो आखिर क्यों मैं उसे याद करूँ ?

और क्यों कहूं उसे आज मैं संगदिल 
जब दिल तो बस मैंने था उससे लगाया ?
उसके साथ बीते हर पल को अपनी आँखों में था बिठाया...
के शायद वही था मेरी ज़िन्दगी का सरमाया...

ऐ हवा जा उसके आँचल को सहला,
उसकी जुल्फों में कहीं खो जा
और बस इतना सा काम और कर,
के जब वो तनहा हो अगर...

तो मेरा नाम उसके कानों में जाके धीरे से कहना
देख के कहीं उसे चोट न लग जाये 
जरा प्यार से उसे अपनी बाहों में तुम लेना
और याद दिलाना के आज भी कोई है जो उसे याद करता है

कोई है जो आज भी उसकी तस्वीर को देख के गज़लें लिखा करता है...
आज भी वो मेरी कहानियों में शामिल सी दिखाई देती है...
आज भी कहानी के हर दृश्य में वो मेरी नायिका बन के इठलाती है
आज भी मैं उससे उतना ही प्यार करता हूँ 
और आज भी उसके दीदार का इंतज़ार करता हूँ...

वो मेरी ज़िन्दगी का हर लम्हा चुरा के ले गई
ऐ वक्त ! जरा उसे मेरी कमी महसूस मत करा 
के फूलों सी नाजुक है वो 
कहीं बिखर न जाए 
उसका ख्याल रख 
उसे मेरे दिल में बसा 

के याद नहीं करना उसे अब 
जिसे पाने की तमन्ना आज भी है 
वो दूर ही सही पर मुझे 
ऐ मेरे "माही"!
तुझसे मुहब्बत आज भी है ...

१२ जुलाई २०११ 
4:26 am

मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

बेवफा

जब उनको दिल लगाना न आया,
तो उन्होंने हमसे दिल्लगी कर ली.
पर हम तो समझे इसे दिल की लगी,
और इश्क में उनके हमने, खुदकुशी कर ली.

जब मेरी मौत पर उन्होंने, दो आँसू बहाए तो लगा,
के मेरी मुहब्बत को ज़न्नत मिल गया...
पर उनके झूठे अश्कों की धार में
मेरा सारा वहम धुल गया...

मुझे लगा के वो भी मुझसे सच्चा प्यार करते हैं,
पर वो तो एक आशिक के दिल से सिर्फ खिलवाड़ करते हैं.

उन्होंने जब माँगी,
तो उनके इश्क में हमने भी दे दी जान,
पर वो आज तक न सके,
कभी मेरे प्यार को पहचान...

मेरी मौत को वो भूल गए, एक दुर्घटना समझ कर.
और मेरे साथ को वो भूल गए, शायद एक बुरा सपना समझ कर.

तभी तो आज मेरी मुहब्बत ही मुझ पर हँस रही है
जैसे कोई नागिन, फन फैलाये मुझे डस रही है.

अब उनको कैसे मैं कह दूँ, "बेवफा"
जब मेरी किस्मत ने ही न की कभी मुझसे कोई वफ़ा ?

इसलिए ऐ सनम !
आज मैं तुझको माफ़ करता हूँ...
तुझे न मिले कभी ऐसा कोई धोखा,
यही खुदा से आज मैं फरियाद करता हूँ...

महेश बारमाटे "माही"
27th Oct. 2007

बुधवार, 28 जुलाई 2010

तेरी याद

तेरी याद 

तुम मुझे अब याद नहीं करती,
अपने दिल से अब मेरी बात भी नहीं करती...
शायद ज़िन्दगी में तुम्हारी, अब कोई और आ गया है,
इसीलिए अब तुम मुझसे बात नहीं करती...


तुमको तो पता है के जब तेरा दिल मुझे याद करता है,
तब वो मेरे दिल से बस तेरी ही बात करता है...
पर अब तो ये आलम है के तू अब मेरी यादों पे हाथ तक नहीं फेरती...


जानता हूँ के तुम मुझसे प्यार नहीं करती,
और शायद इस दोस्त का इंतज़ार भी नहीं करती...
पर क्या हुआ तेरे उन वादों का,
जिनके बगैर शायद न कभी मेरी ज़िन्दगी नहीं सँवरती...


कहते हैं - दोस्ती और प्यार का इम्तिहान एक जैसा होता है,
मुसीबत के वक़्त किया गया हर एहसान एक जैसा होता है...
आज जकड़ा गया है मुसाफिर, वक़्त की जंजीरों में फँसकर,
और एक तू है जिसने साथ चलने का वादा तो किया,
पर मुझे इस कैद से फ़रार नहीं करती...


जी करता है के आज तुझे कोई बददुआ दे दूँ,
फिर भी दिल में मेरे, तेरी ख़ातिर बस दुआएँ ही भरी हैं...
और गर दूँ भी तो कैसे दूँ तुझे मैं बददुआ कोई,
क्योंकि मेरी किस्मत कभी मेरी बददुआ किसी के लिए भी स्वीकार नहीं करती...


शायद तेरा मेरा साथ बस यहीं पे ख़त्म होना था...
मुझे आज नहीं तो कल तुझसे शायद ज़रूर जुदा होना था...
अब तो बस याद आयेंगे वो पल,
जब दूर होके भी तू मेरे करीब थी हर पल,
वो भी क्या दिन थे, जब तू मेरी किसी बात के लिए इन्कार नहीं थी करती...


आज बस यही दुआ है मेरी के तू खुश रहे सदा...
गर मिलती है हर ख़ुशी तुझे, होकर मुझसे जुदा...
आज आँखे मेरी, तेरी सदा सलामती की हैं दुआ करती,
क्योंकि गर मर भी जाऊं मैं, तो भी ऐ दोस्त ! दुनिया में दोस्ती कभी नहीं मरती...

महेश बारमाटे
27th July 2010