रविवार, 19 फ़रवरी 2017

शायद..

कभी किसी जनम में शायद

शायद पिछले ही जनम में शायद

तेरा मेरा कोई नाता रहा होगा

जिसे लिखना बाकि रह गया होगा

के हम दूर हो के भी पास हैं

दिल में, इक दूजे के एहसास है

आज चोट लगे तुझे

या बीमार मैं हो जाऊं

असर उस ओर भी होता है

रोये जो अंख तेरी

दिल मेरा भी रोता है

जो हो ख़ुशी का एहसास तुझे

अंख मेरी हंसती है

दिल की दीवार पे आज भी

तस्वीर तेरी ही जचती है।

बस ऐसी ही कुछ यादों के साथ

कुछ मनमानी बातों के साथ

दिल खुश हो लेता है

के कभी किसी जनम में शायद

शायद इसी जनम में शायद

तेरा मेरा कोई नाता रहा होगा

जो न पूरा हो सका

जो भी कुछ उसने लिखा होगा।

#महेश_बारमाटे_माही
14/02/17
8:44 am

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

मेरा हिस्सा.. तेरा किस्सा..

देख तेरी तस्वीर को

मुझे एक किस्सा याद आया

ज़िन्दगी का मेरी

एक हिस्सा याद आया।

मेरे हिस्से की ज़िंदगी में

बस तेरा ही किस्सा है माही!

जो पल बिताया है साथ तेरे

वो इक पल भी न तेरे बाद आया।

#माही

गुरुवार, 12 जनवरी 2017

बेचैनी..

एक अजीब कश्मकश में हूँ

आज खुद के लिए ही कुछ खास मैं हूँ।

के कुछ गलतफहमियां

जो थी दरमियान हमारे

ख़त्म हो गईं

ख़त्म हुए फासले

पर दूर न हुई ये दूरियां।

तुझसे

शायद खुद से

बात करने को

बेताब मैं

आज कुछ यूँ मचल रहा हूँ

बिन पानी कोई मछली जैसे

उड़ने को बेताब

मेरा हर एक ख्वाब

पर न नींद है

न चैन है

जाने क्यों

दिल ये बेचैन है??

#माही

रविवार, 8 जनवरी 2017

ये ज़िन्दगी..

ज़िन्दगी भी अजीब है

जो बीत गया

उसे याद करती है,

आने वाले कल की

फरियाद करती है,

जो आज है

उसे ठुकरा देती है,

और कल फिर

उसके लिए ही मोहताज करती है।

सच में

ये ज़िन्दगी बड़ी अजीब है

मुझे धूल से उठाती है

किसी के आँखों का सरताज करती है

फिर मिला के उसी धूल में

ये ज़िन्दगी

मुझ पर ही राज करती है।

#माही
3/1/17
10:09pm

गुरुवार, 17 दिसंबर 2015

ये ज़िन्दगी..

पाँच पांडवों के बीच फँसी
द्रौपदी सी हो गयी है ज़िन्दगी।
किसका कब साथ निभाऊं
कुछ समझ में नहीं आता।
जहाँ देखूँ
वहीँ पे मेरा अपना खड़ा होता है,
पर किसके साथ
कहाँ जाऊँ
कुछ समझ में नहीं आता।

मैंने तो चुना था बस एक को
ठुकरा के जाने कितने अनेक को
फिर भी मिले साथ में और चार
पाँच कश्तियों में सफ़र करूँ अब कैसे
ओ मेरे यार!

इस सफ़र का जाने
कौन असल वाहक होगा?
मिले जो फल मुझको
तो किसका मुझपे हक़ होगा?

गर कभी एक की हुयी ये ज़िंदगानी
तो अगले को मुझपे ही शक होगा।
जाने किस मोड़ पर ज़िन्दगी
कब किसके सीने में मेरे लिए धकधक होगा।

ऐसे ही न जाने कितने
सवालों में हर रोज घूम रही है ज़िन्दगी
पाँच पांडवों के बीच फँसी
आज द्रोपदी सी लग रही है ज़िन्दगी।

हाँ!
ये मेरी ज़िन्दगी!

#महेश_बारमाटे_माही
17 दिसम्बर 15
8:20 am

(ये केवल मेरे विचार हैं, कृपया कर इस कविता को अन्यथा न लें)

शनिवार, 21 नवंबर 2015

सफ़र-ए-दर्द का राही

जागता रहा रात भर
अपने गुनाहों को याद करता मैं
खुद से ही माफ़ी माँगता
और खुद को ही सजा देता मैं।

हर सजा के बाद
गुनाह खुद मुझसे पूछता
क्यों तूने मुझे किया
और फिर मुझसे रूठता।

न जवाब था
न शर्मिंदगी
जाने किस मोड़ पे आयी
आज ये ज़िन्दगी।

मैं जागता रहा
गुनहगार की तरह
सोती रही क़िस्मत
जाने किस जगह।


अब न माफ़ कर
मुझे मेरे माही!
के सजा भी मेरी
गुनाह भी मेरा
मैं सफ़र-ए-दर्द का हूँ एक राही।

#महेश_बारमाटे_माही
21 Nov 2015
6:25 pm

शुक्रवार, 13 नवंबर 2015

जाने क्यों..?

जब मैं तुमसे मिली थी
तब कुछ खास नहीं लगे तुम
पर शायद
कोई तो बात थी तुममे
जिस कारण
मैने तुमसे
दोस्ती करना चाही।
हममे
धीरे धीरे
बात
बातों की शुरुआत हुई।
फिर इन्हीं
बातों बातों में
मैं तुम्हे जानने लगी।
तुम इतना सच बोलते थे
कि अक्सर डर लगता था मुझे
कि अगर
हमारा रिश्ता आगे बढ़ता है तो
हम कैसे एक रह पाएंगे
बस इसी डर से
मैंने तुमको ठुकरा दिया था।
पर
जाने तुझमे क्या बात थी
जो तुम मुझे
अपने पास
वापस ले आये।
मैं फिर आई
तुम्हारी ज़िन्दगी में।
बस तुमको सुनने के लिये
मैं तुमसे बात करने लगी
बस तुमको देखने के लिए
तुम्हारी फोटो तुमसे मांगने लगी।
सब जानती थी मैं
तुम्हारे बारे में
कि तुम इश्क़ के काबिल नहीं
फिर भी
अब मैं तुमसे प्यार
करने लगी।
पर रहना था मुझे
प्यार से दूर
बस इसीलिए मैं
इन्कार करने लगी।
और फिर वही हुआ
जब तुमने सच में
इन धड़कनों को छुआ।
पर तुमने धोखा दिया
मुझे अपना के मुझसे दगा किया।
और चले गए दूर मुझसे
जाने क्यों हुए इतने मजबूर खुद से।
मैंने भी तब
तुमसे दूर जाने का
फैसला किया
पर दिल है कि मानता नहीं
ये आज भी
तुझे सुनने की ज़िद करता है
चोरी छुपे हर रोज
ये बस तुझको ही पढ़ता है।
सोचती हूँ
कि अब तो तुम बहुत दूर हो माही!
पर फिर भी
ये दिल मेरा
बस तुम्हारे लिए ही आज भी
जाने क्यों धड़कता है।
पता नहीं..
आखिर क्यों??

#महेश_बारमाटे_माही

बुधवार, 14 अक्तूबर 2015

दीवानी हूँ मैं उसके प्यार की..

ए साहिब!
पागल न कहना मुझे
के दीवानी हूँ मैं उसके प्यार की
वो माही है मेरा
और मंज़िल हूँ मैं उसके नाम की।

क्या कहना अदाओं के उसके
के कभी बड़ा हँसाता है वो मुझको
रो लेता है खुद में ही
पर बड़ा गुदगुदाता है वो मुझको।

उसकी सारी बातें
और वो शरारतें
बड़ा याद आती हैं
वो नटखट मुलाकातें।

वो मेरी जुदाई में
उसका शायरियाँ लिखना
और बस मेरे लिए ही
खुद में ही उसका अच्छा दिखना।

बड़ा तड़पाता है वो मुझे कभी कभी
पर बड़ा याद आता है वो मुझे हर कभी
जी रही हूँ आज बस उसके लिए मैं
गर वो न हो तो ख़त्म हो जाये ये ज़िन्दगी बस अभी।

ए साहिब!
पागल न समझ तू मुझको
के दीवानी हूँ मैं उसके प्यार की
एक तलब है मुझे
अब उसके इंतज़ार की।

देखना
वो जरूर आएगा
मिलने मुझसे
ए साहिब!
के वो माही है मेरा
और मैं मंज़िल हूँ
उसके नाम की।

पागल न बोल मुझको
के मैं तो दीवानी हूँ
हाँ
बस उसके नाम की।

#महेश_बारमाटे_माही
14/10/15
1:50 am