सोमवार, 1 मई 2017

पहले तो ऐसा न था कभी..

पहले तो ऐसा न था
के तुझे देखने की तड़प
तुझे सुनने का एहसास
तुझे छूने की चाह
और तेरा होने की प्यास..
कहाँ था ऐसा कुछ भी
जो भी था
वो
वो जैसे कुछ धुंधला धुंधला सा
याद आता है
पर
जो अब है
वो पहले तो न था
हम
मिलते नहीं थे
अब
साथ रहते हैं
एक दूजे के दिल में
जैसे
अनजान थे पहले
पर अब
बहुत कुछ जान गए हैं
फिर भी जाने क्यों
दिल ये मेरा
तेरे लिए अनजान ही बना रहना चाहता है
ताकि
तुझे और जान सकूँ
पर..
पहले तो ऐसा न था
जो अब है।
ये रिश्ता
एक नए मोड़ पर है
क्या तुझे एहसास है
या
ये बस मेरी प्यास है??
जो भी है
एक धीमी तड़प है
फिर भी सुखद है
जैसे
गुलाब के फूल संग काँटे।
दिल करता है
कभी कभी
तुझे मोबाइल फोन पे ही
अपनी छुअन का एहसास दिलाऊँ
और उसी एहसास में
मैं भी
गुम हो जाऊं
कहीं
खो जाऊँ।
बस
तेरा हो जाऊं..
क्या तुमने सोचा कभी
माही!
पहले तो ऐसा न था कभी..
है न??

महेश_माही
1 मई 2017
10:29 pm

गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

पत्थर की हवेली..

पत्थरों पे बनी कारीगरी
देख बीता जमाना याद आया
वो लकड़ी की चौखटें
और भारी दरवाजों पे लटकी
लोहे की मोटी सांकरे
और
मोटे मोटे स्तंभों पे जमी इमारतें
जैसे आवाज दे रही हों
पत्थरों से बनी चिलमनें
के सुन ले ए मुसाफिर!
मेरे दर पे गुजरी आहटें।
कभी गूंजा करती थी
चंहु ओर किलकारी सी
आंगन में सजती थी
नित नए फूलों की फुलवारी सी
खलिहान में लगे नीम के पेड़ तले
चौपाल लगा करती थी
और घर के एक कोने में
गोशाला सजा करती थी।
गिनती में कम थे
पर मेरी खूब सेवा करते थे
मेरी ठंडी छांव में
पीढ़ियां गुजरा करती थी।
मेरे दरवाजों पे घोड़े हाथी
सलाम किया करते थे
मय खाने का भी था एक कमरा
जहां साकी के संग मालिक भी
एक नई ज़िन्दगी जीया करते थे।

अब न जाने कहाँ खो गई
वो किलकारी
वो हंसी ठहाके वाली महफिलें
वो मेहमान नवाजी
और वो बंद पर्दों के पीछे की
मौन चाहतें।
सजावट का अब वो नाम नहीं
जिनसे ये पाषाण दीवारें सजा करती थी
देख के अपनी खूबसूरती माही!
मैं भी इठलाया करती थी।
अब वो मेरा रंग रूप नहीं
न वो साजो-श्रृंगार है
मेरी भव्यता का लोहा
हो गया जंग-सार है।
सच कहूं मैं अपनी कहानी
तो
पहले बस मैं थी पत्थर की
और मेरे मालिक दिलदार थे
अब दिल हो गए पत्थर के
न मेरा नामो-निशान है।

न मेरा नामो-निशान है..

#महेश_माही
13/04/17
1:08  pm

बुधवार, 5 अप्रैल 2017

दिल अब भी तुझे याद करता है..

रात भर तकिये से लिपट के सोता रहा

और तुम कहते हो के मुझे तेरी याद नहीं आती

दिल अब भी तुझे याद करता है,

बस इन लबों पे ये बात, हर बार नहीं आती।

तेरी कमी का एहसास

मुझे हर पल होता है

तू पास नहीं मेरे

फिर भी तू मेरे पास ही सोता है।

तेरी खुशियों से बढ़कर

कोई चीज न चाही मैंने

फिर भी रह गई कुछ कमी

जो अक्सर मुझे दिखाई तुमने।

आज भी ये लगता है

के हर कदम तुम साथ निभाओगे

मुझसे दूर होने की बात करती हो

बोलो कैसे मुझे भुला पाओगे?

आज भी तकिये से लिपट के सोता हूँ

तू नहीं, तेरा एहसास ही सही

पर ओ मेरे माही!

मैं हर पल तेरे साथ ही होता हूँ।

#महेश_माही
27/09/16
6:44 am

रविवार, 19 फ़रवरी 2017

शायद..

कभी किसी जनम में शायद

शायद पिछले ही जनम में शायद

तेरा मेरा कोई नाता रहा होगा

जिसे लिखना बाकि रह गया होगा

के हम दूर हो के भी पास हैं

दिल में, इक दूजे के एहसास है

आज चोट लगे तुझे

या बीमार मैं हो जाऊं

असर उस ओर भी होता है

रोये जो अंख तेरी

दिल मेरा भी रोता है

जो हो ख़ुशी का एहसास तुझे

अंख मेरी हंसती है

दिल की दीवार पे आज भी

तस्वीर तेरी ही जचती है।

बस ऐसी ही कुछ यादों के साथ

कुछ मनमानी बातों के साथ

दिल खुश हो लेता है

के कभी किसी जनम में शायद

शायद इसी जनम में शायद

तेरा मेरा कोई नाता रहा होगा

जो न पूरा हो सका

जो भी कुछ उसने लिखा होगा।

#महेश_बारमाटे_माही
14/02/17
8:44 am

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

मेरा हिस्सा.. तेरा किस्सा..

देख तेरी तस्वीर को

मुझे एक किस्सा याद आया

ज़िन्दगी का मेरी

एक हिस्सा याद आया।

मेरे हिस्से की ज़िंदगी में

बस तेरा ही किस्सा है माही!

जो पल बिताया है साथ तेरे

वो इक पल भी न तेरे बाद आया।

#माही

गुरुवार, 12 जनवरी 2017

बेचैनी..

एक अजीब कश्मकश में हूँ

आज खुद के लिए ही कुछ खास मैं हूँ।

के कुछ गलतफहमियां

जो थी दरमियान हमारे

ख़त्म हो गईं

ख़त्म हुए फासले

पर दूर न हुई ये दूरियां।

तुझसे

शायद खुद से

बात करने को

बेताब मैं

आज कुछ यूँ मचल रहा हूँ

बिन पानी कोई मछली जैसे

उड़ने को बेताब

मेरा हर एक ख्वाब

पर न नींद है

न चैन है

जाने क्यों

दिल ये बेचैन है??

#माही

रविवार, 8 जनवरी 2017

ये ज़िन्दगी..

ज़िन्दगी भी अजीब है

जो बीत गया

उसे याद करती है,

आने वाले कल की

फरियाद करती है,

जो आज है

उसे ठुकरा देती है,

और कल फिर

उसके लिए ही मोहताज करती है।

सच में

ये ज़िन्दगी बड़ी अजीब है

मुझे धूल से उठाती है

किसी के आँखों का सरताज करती है

फिर मिला के उसी धूल में

ये ज़िन्दगी

मुझ पर ही राज करती है।

#माही
3/1/17
10:09pm

गुरुवार, 17 दिसंबर 2015

ये ज़िन्दगी..

पाँच पांडवों के बीच फँसी
द्रौपदी सी हो गयी है ज़िन्दगी।
किसका कब साथ निभाऊं
कुछ समझ में नहीं आता।
जहाँ देखूँ
वहीँ पे मेरा अपना खड़ा होता है,
पर किसके साथ
कहाँ जाऊँ
कुछ समझ में नहीं आता।

मैंने तो चुना था बस एक को
ठुकरा के जाने कितने अनेक को
फिर भी मिले साथ में और चार
पाँच कश्तियों में सफ़र करूँ अब कैसे
ओ मेरे यार!

इस सफ़र का जाने
कौन असल वाहक होगा?
मिले जो फल मुझको
तो किसका मुझपे हक़ होगा?

गर कभी एक की हुयी ये ज़िंदगानी
तो अगले को मुझपे ही शक होगा।
जाने किस मोड़ पर ज़िन्दगी
कब किसके सीने में मेरे लिए धकधक होगा।

ऐसे ही न जाने कितने
सवालों में हर रोज घूम रही है ज़िन्दगी
पाँच पांडवों के बीच फँसी
आज द्रोपदी सी लग रही है ज़िन्दगी।

हाँ!
ये मेरी ज़िन्दगी!

#महेश_बारमाटे_माही
17 दिसम्बर 15
8:20 am

(ये केवल मेरे विचार हैं, कृपया कर इस कविता को अन्यथा न लें)