शनिवार, 1 अगस्त 2020

वो, महफ़िल और इश्क़

मैंने कुछ कहानियाँ गढ़ीं
कुछ किस्से कहे
वो शामिल थे मुझमें
वो सुनते रहे।

वो दूर बैठे थे महफ़िल में
तमाशबीन बन कर
सीने से लगने को जी किया
अश्क़ बहते रहे।

महफ़िल में हर शख्स ने 
तारीफ में उनकी वाहवाही लुटाई
इशारों - इशारों में नज़रें फिरा कर हम भी
बस उनके चेहरे को ही देखते रहे।

चारों तरफ खामोशियाँ सी फैल गईं
जब लबों पे नाम तेरा आया माही!
तुमने इज़हार-ए-ज़ुल्म-ए-मुहब्बत कर लिया
तुम जो महफ़िल को छोड़ गए।

- महेश "माही"

बुधवार, 22 जुलाई 2020

हाँ! यही तो प्यार है..




मेरी लिखावटों के पीछे
दरार है
मेरी लिखावटों के पीछे 
दरार है
हाथ काँपते हैं मेरे
तेरा नाम लिखने से
हाँ! यही तो प्यार है।

तुझसे छुपाया नहीं जाता
मुझसे बताया नहीं जाता
आँख बंद करके भी हो जाये
ये कैसा दीदार है..?
हाँ! यही तो प्यार है।

दर-ओ-दीवार-ए-दिल पे तेरी तस्वीर
जो लगा रखी है
इल्तिज़ा लोगों की आती है 
कि एक बार तो पर्दा उठे।
मैं न कर देता हूँ सबसे
तुझसे जो मेरा इक़रार है।
हाँ! यही तो प्यार है।

किताबों के बीच में
गुलाबों सा सजाया है तुझे
करके सजदा हजारों दफा
अपना बनाया है तुझे
किताबी सा नहीं माही!
मेरी रूह का ये इज़हार है
हाँ! मुझे तुमसे प्यार है।

- महेश "माही"

शनिवार, 4 जुलाई 2020

वो पक्के रंग वाला लड़का



वो पक्के रंग वाला लड़का
लोग उसे काला
तो कभी सांवला कहते थे।

गोरा होना उसके बस में न था कभी
बस अपने रंग में ढल जाना
खुद को बुरा न मानकर
बस खुद को अपनाना
ही था उसके बस में।

और फिर 
उसने किसी गोरे को गोरा कहकर
नीचा नहीं दिखाया
पर उसका रंग
जाने क्यों गोरे लोगों को कमतर लगता ?

आज उसके पक्के रंग की तरह
उसका निश्चय भी पक्का है
कि गोरा रंग तो धूप में ढल जाएगा
क्योंकि वो कच्चा है।
और पक्का रंग 
छूटता नहीं कभी
वो और पक्का होता जाता है।

समय और प्रकृति कभी
कोई भेद नहीं करती।
फिर ये भेद कहाँ से आया।
क्यों एक पुराने गाने में
राधा को गोरी, और कृष्ण को काला बताया
क्यों कृष्ण ने खुद को
खुद से ही कमतर जताया..?

हाँ! वो पक्के रंग वाला लड़का
कई कच्चे रंग वालों से
बेहद अच्छा है।
क्योंकि
खुद को कमतर न समझने वाला वो लड़का
आज सबसे सच्चा है।

- महेश "माही"

सोमवार, 22 जून 2020

एहसासों का समंदर


एहसासों का समंदर है
भावनाओं की कश्ती है
ख्वाबों का साहिल है
धुन्ध में भी आँखों में मस्ती है।

लिख दूँ तो हासिल है
छुपा लूँ तो कातिल है।

एहसासों की कहानी है
जो आँखों की जुबानी है।

चीखते हैं सन्नाटे
भीड़ में तन्हाई हैं बाँटते

कुछ अल्फ़ाज़ 
कुछ शायरी है
कुछ बेहोशी 
कुछ खुमारी है।

मेरे अंदर आज
भी एक दरिया उफनता है
कुछ खुमार सा चढ़ता है
कुछ तेरे मन सा ठहरता है।

मेरी कहानियों में बस
माही तू ही तो बसता है
मेरी मुस्कान के संग 
हमेशा तू ही तो हँसता है।

तुझे खो न दूँ कहीं
जो तू मिले, 
तो खो न जाऊं कहीं।

बाँहो में तेरी
जन्नत की सैर है
तुझसे कब रहा 
मेरा कोई बैर है।

खत्म होती नहीं
जो कहानी तेरे नाम लिखता हूँ
कभी आईने में देख माही!
मैं कुछ - कुछ तुझसा ही तो दिखता हूँ।

हाँ! तुझसा ही तो दिखता हूँ..।

- महेश "माही"

रविवार, 21 जून 2020

तुम्हें वो याद करता है..

तुम्हें वो याद करता है
हाँ! फरियाद करता है।
वो इश्क़ में तेरे
उस दिन का इंतज़ार करता है
जिस दिन दिल से वो कहे
कि वो सिर्फ तुमसे ही प्यार करता है।
तेरी हाँ और न का उसे कोई फर्क नहीं है अब
कि रूह के आशिक़ के पास कोई शर्त नहीं है अब।
कुरबतें उसकी जरूरत नहीं थी कभी
बस मुहब्बत में वो अब विश्वास करता है।
मुहब्बत में ही जीना है
मुहब्बत में ही मर जाना
ओ मेरे माही!
तू मिले तो बस तुझमें ही समा जाना।
यही इक़रार है उसका
यही इंतज़ार है उसका।
तुम्हें वो याद करता है
हाँ! फरियाद करता है।
एक दिल है सीने में 
जो बस यही ख़्वाहिश हर बार करता है।

- महेश "माही"

सोमवार, 11 जून 2018

कुछ तो है... (Kuch toh hai...)


कुछ अंदर दबा हुआ सा है
चुभता है ठूंठ सा
अपनी आवाज को भी नहीं सुनता मैं
चीखता हूँ गूँज सा।

एक तरफ तन्हाइयों का शोर है
दूजी तरफ ग़मों का सन्नाटा पसरा हुआ है
किस तरफ रखूँ कदम अपने
फर्श पे मेरा मैं बिखरा हुआ है।

अपनी लाश पे चलके
निकल जाना है
ऐ दुनिया! तुझसे मेरा
ऐसा ही रिश्ता पुराना है।

तेरा रस्ता देखते
सदियाँ गुजर गई
कैसे तू आता माही!
के वादों की अब तो राहें बदल गई

- महेश बारमाटे "माही"

बुधवार, 9 मई 2018

मेरे गाँव वाले घर में..



छोटे - छोटे दरवाजे

मोटी - मोटी दीवारें थीं

मेरे गाँव वाले घर में

न किसी के दिल में दरारें थीं।


बड़े छोटे से कमरे में

पूरा परिवार रहता था

सुख - दुख के सारे मौसम

हर कोई संग सहता था।


पुरानी एक तश्वीर टंगी थी

पुरखों वाले कोने में

डर का कोई सवाल नहीं था

घुप्प अँधेरों में सोने में।


नीम की छाँव में बीते शामें

दादी - नानी की कहानियों में सदियों के कारनामे 

बीत जाता था पूरा साल

पहन के चंद फटे पायजामें।


छोटी सी खुशी में भी

पूरा गाँव खुश होता था

ग़म की अगर खबर मिले तो

पूरा गाँव संग हमारे रोता था।


आधुनिकता की भागदौड़ में

वो छोटा दर-ओ-दरवाजा टूट गया

जानें कहाँ गया वो जीवन माही!

लगे जैसे भगवान हमसे रुठ गया..।


- महेश बारमाटे "माही"

7 मई 2018

शुक्रवार, 27 अप्रैल 2018

बीती रात..



रौशनी तो कम हो गई थी
पर आँखों के चराग
अब भी जल रहे थे
हम बीती रात
दिल मे लिए कई ख्वाब
अनजानी राहों में चल रहे थे।

इक आहट हुई
और ख्वाबों का मेहताब टूट गया
कुछ टुकड़े चुभे दिल की ज़मीं पे
कोई अरमां आँखों से रिसता हुआ रुठ गया।

अँधेरों में सोने की आदत नहीं थी
उजालों ने डरना सिखा दिया
वक़्त-ए-सफ़र भी क्या खूब गुजरा माही!
के फैसले की घड़ी में उसने तुझे मेरा दीवाना बना दिया..

महेश बारमाटे "माही"
27 apr 18