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मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

वो...


हर पल रंग बदलती ज़िंदगी को वो एक ही रंग में देखना चाहती थी...
नादान थी वो जाने कैसी...
के अपने हर पल में खुद को संग मेरे देखना चाहती थी...

वो जानती थी के ये पल कभी ठहरता नहीं,
और फिर भी
मुझे वक़्त के हाथों से मांगना चाहती थी...

एक ख्वाब उसने भी देखा था शायद,
वक़्त की दीवार में वो भी कुछ कुरेदना चाहती थी...

वो जो भी थी मुझे पुकारती थी कह के माही!
शायद अपना नाम मेरे नाम के संग जोड़ना चाहती थी...

- महेश बारमाटे "माही"
24 जनवरी 2013

शनिवार, 10 सितंबर 2011

वो... मुझसे पूछा करती थी...

वो हर सुबह मुझसे 
मेरा ख्वाब पूछा करती थी...
कैसा था वो बीती रात का 
बादलों के पीछे छिपता महताब पूछा करती थी...। 

गुरुवार, 9 जून 2011

वक्त-ए-कश्मकश...

वो कहते थे कि तेरे बगैर दिल कहीं लगता नहीं "माही",
पर वो मेरा दो पल भी इंतज़ार ना कर सके... 

के दो पल की और ज़िन्दगी मांगने गया था मैं खुदा से उसकी खातिर,
जो कभी वादे पे मेरे ऐतबार ना कर सके...

या खुदा ! खूब देखा तेरी भी रहमत का नज़ारा हमने,
के दे दी ज़िन्दगी फिर उसके लिए, जो हमसे फिर कभी प्यार ना कर सके...

और अब तन्हा हैं ये सोच के,
के शायद हम ही कभी उनसे अपने वादे का ठीक से इज़हार ना कर सके...

आज रो रहे हैं के गम-ए-फुरकत से सामना होगा अब हमारा,
के क्यों हम तुमसे कभी इकरार ना कर सके ?

और जाने वो कैसा वक्त-ए-कश्मकश था "माही"
जब हम भी तेरे प्यार को इन्कार ना कर सके...?

महेश बारमाटे "माही"
9th June 2011

मंगलवार, 31 मई 2011

मैं तो बस मोमबत्ती हूँ...

तिल-तिल करके जलती हूँ,
जग को रौशन करती हूँ,
शाम से लेकर रात तक
हर बूँद मैं पिघला करती हूँ...

अंधियारे के संग लड़ती हूँ,
हर पल खुद का दमन करती हूँ,
जल-जल के ही तो मरती हूँ,
के हर बूँद मैं पिघला करती हूँ...

किसी ने यूँ ही,
तो किसी ने मूर्त (रूप) देके मुझको जलाया,
गम इसका कभी नहीं करती हूँ,
के हर बूँद मैं पिघला करती हूँ...

मेरी हर मौत को उसने,
न जाने कैसे था भुलाया,
के जब भी जला करती हूँ,
घर उसका रौशन करती हूँ...

मेरी शमा को देख के,
कभी कोई परवाना भी था इतराया,
जला के उसको भी मैं,
नाम उसका रौशन करती हूँ...

मैं तो बस मोमबत्ती हूँ 
हर लौ में जला करती हूँ
कभी उफ़ भी नहीं करती हूँ 
के हर बूँद मैं पिघला करती हूँ...

मत भूल मेरे वजूद को "माही",
मैं तो बस एक मोमबत्ती हूँ,
सदियों पहले जो करती थी,
वो आज भी किया करती हूँ...

घर तेरा रौशन करती हूँ,
और अंधियारे से भी लड़ती हूँ,
मर के भी जिंदा रहती हूँ,
के हर बूँद को जिया करती हूँ...

महेश बारमाटे "माही"
२५ मई २०११ 

गुरुवार, 26 मई 2011

अब ये दर्द सहा नहीं जाता

कभी कभी किसी का मजाक
किसी को दर्द दे जाता है...
या अल्लाह ! तू ऐसे रिश्ते आखिर किस लिए बनाता है ?

 के दिल दुखता होगा तेरा भी...
जब कोई इन्सां किसी की मौत बन जाता है.

किसी का चैनो-सुकून छीन के वो
अपनी नयी दुनिया बसाता है.

और फिर कोई तीसरा आकर,
तेरी कायनात को ज़मीन के टुकड़ों में बाँट जाता है.

तेरे ही नाम पर खुद को तेरा
अजीज़ बताने वाला इन्सां, मज़हबी दंगे करवाता है.


कोई अपनी माँ का
तो कोई सारे हिन्दुस्तां का 
दिल चीरता चला जाता है.
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
हे परम पिता परमेश्वर !

क्या इसी तरह की तू दुनिया बनाना चाहता है ?

क्या तेरे दिल में दर्द नहीं होता,
जब एक छोटा सा मजाक दो दिलों को तन्हा कर जाता है ?

जब एक सच्चा दोस्त,
अपने दोस्त को रुसवा कर जाता है ? 
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
ऐ खुदा !

मालुम है के तुझे भी
हमारा दुःख तन्हा कर जाता है...

तेरी ही दुनिया में हर इन्सां
तुझे ही रुसवा कर जाता है...

तो फिर तोड़ के सारे बंधन
आजा हमें गले लगा ले,
ले अब तो तन्हा रहा नहीं जाता है...
और तेरी तन्हाई का भी
दर्द सहा नहीं जाता है...

के लाख मर्तबा टूट चूका है "माही"
तेरे इंतजार में,
अब तो इस सारी कायनात से
 तेरे बिन रहा नहीं जाता है...

महेश बारमाटे "माही"
17th March 2011

बुधवार, 11 मई 2011

तड़प

मेरा चाँद न जाने कहाँ खो गया है,
लगता है जैसे बादलों की ओंट में छुपकर कहीं सो गया है...

बस उसी को ढूँढती है मेरी नज़र
अब तो हर रात,
न जाने कब कटेगी ये
अमावस की ये काली अँधेरी रात.

उसको देखे न जाने कितने हो गए हैं बरस,
बस उसी के लिए ये आँखे अब तक रही हैं तरस.

उसके बगैर मैं अब चाँद का चकोर हो गया हूँ.
लोग भी कहने लगे हैं के मैं तो अब, पंख कटा मोर हो गया हूँ.

फिर भी दिल में एक आस है
के मैं ढूँढ निकालूँगा उसे 
और मिल जाये तो
इस दिल के मन-मंदिर में सजा लूँगा उसे...


मेरे मन में उससे मिलने की बड़ी आस है,
क्योंकि उसकी एक तस्वीर आज भी मेरे दिल के बहुत पास है.

मैंने तो बस उससे ही मिलने की चाहत की है 
ज़िन्दगी में पहली और आखिरी बार बस उसी से मुहब्बत की है...

इसीलिए ऐ कायनात!
तू अब मुझे मेरा चाँद दिखा दे,
मेरे इतने बड़े इंतजार का मुझे
कुछ तो सिला दे.

कहीं ऐसा न हो के उसे देखे बगैर ही 
मैं इस दुनिया से चला जाऊँ.
जिसकी एक झलक झलक के लिए जी रहा हूँ मैं,
उसको कभी देख ही न पाऊँ.

उसकी यादें ही अब मेरे जीने का एक मात्र सहारा है,
इस दिल के आसमाँ एक बार करे वो रौशन,
बस यही आखिरी अरमाँ हमारा है.

के उसको देखे बागी इस जहाँ से मैं जाना नहीं चाहता.
जिंदगी की आखिरी ख्वाहिश में मैं,
उसके सिवा और किसी को पाना नहीं चाहता...

महेश बारमाटे "माही"

सोमवार, 9 मई 2011

चाहत मेरी...

दिल जानता था ये बात,
के न दोगी कभी तुम मेरा साथ...

फिर भी मैंने तुमसे ही प्यार किया,
दिल के बदले दर्द-ए-दिल मैंने तुमसे ही लिया...

प्यार क्या होता है, ये मैंने न था कभी जाना,
और तुमसे मिलकर ही मैंने था शायद इसे पहचाना.
पर जब खाया मैंने तुमसे धोखा,
तो लगा के शायद अब भी हूँ मैं सच्चे प्यार से अनजाना...

गलती मेरी ही थी शायद,
जो मैंने इसे प्यार समझा...
रहना था दूर जिससे मुझे,
उसे ही अपना दिलबर, अपना दिलदार समझा...

तुम्हे अपना समझ के मैंने,
"मैं क्या हूँ ?" ये भी तुमको बताया...
इशारों - इशारों में ही सही,
अपना हाल-ए-दिल भी मैंने तुमको समझाया...

पर मुझे क्या पता था, के तू अपने जैसा सबको समझेगी,
मेरे प्यार को महज एक दिल्लगी समझेगी...

मेरी हर कहानी में तुम थी,
मेरी हर कविता में भी तुम थी...
आँखों से जो कभी बहे, उस पानी में तुम थी...
मेरे दिल ने जो चाही थी लिखनी,
हर उस कहानी में भी तुम थी...

पर अब तू मेरे लिए, सिर्फ एक कहानी हो गई है...
तेरी हर एक अदा मेरे लिए, अब पुरानी हो गई है...

क्योंकि जो कुछ लिखा था मैंने तेरे लिए,
उसकी आज ये दुनिया दीवानी हो गई है...
मैं भूल चूका हूँ तुझे,
और तू अब दुनिया की भीड़ में खड़ी अनजानी हो गई है...

मुझे पता है के ये बातें सुनकर भी,
तुझको कोई फर्क नहीं पड़ेगा...
मेरी किसी बददुआ से भी तुझको,
कभी नर्क नहीं मिलेगा...

क्योंकि मैं चाहता हूँ के तुझको
दुनिया भर की हर ख़ुशी मिले...
और उस हर एक ख़ुशी में तुझको,
हर बार मेरी ही कमी मिले...

- महेश बारमाटे "माही"
२२ अप्रेल २००८ 

जरा यहाँ भी गौर फरमाइए... 

मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

दूरियाँ हैं बढ़ने लगीं दरमियाँ हमारे...

अनचाही सरहदें हैं खिंचने लगीं, अब दरमियाँ हमारे...
बेवजह ही दूरियाँ हैं बढ़ने लगीं, अब दरमियाँ हमारे...

तेरा आना ज़िन्दगी में मेरी,
अब एक ख्वाब हो गया है.
के पल-पल में ही टूटने लगे हैं रिश्ते,
अब नींद और दरमियाँ हमारे...

जनता हूँ के हम कुछ भी न थे कभी ज़िन्दगी में उनकी,
पर दूरियाँ इतनी भी न थी कभी दरमियाँ हमारे...

अब तो लगता है 
के जान - पहचान का ही रह गया है
बस रिश्ता दरमियाँ हमारे...

के आज उसका शोना - माही
छिपने लगा है वक़्त की धुंध में,
के जब से अजनबी कोई,
इश्क उनका बन के आया है दरमियाँ हमारे...

ऐ सनम ! एक बार तो जरा,
इनायत कर मुझ पे ओ निर्ज़रा !
के लगता है आज मौत खड़ी है,
फिर रिश्तों के दरमियाँ हमारे...

आज फिर है देख रहा ये माही !
खुद को एक दो-रहे पर खड़ा...
के तेरी सोच के संग ऐ सनम !
बदलने लगा है अब सब कुछ,
बस दरमियाँ हमारे...

महेश बारमाटे "माही"
26th Apr. 2011

शुक्रवार, 11 मार्च 2011

डर...

आज डर रहा हूँ मैं,
खुद से ही बात करने के लिए...
जाने क्या हुआ है मुझे,

के डर रहा हूँ ख़ुशी के इन पलों में एक पल भी हँसने के लिए...

जाने मेरी क्या है मजबूरी,
या किस शख्स की है मुझसे दूरी,

के आज डर रहा हूँ खुद का ही इन्तज़ार करने के लिए...

कोई तो बात है,
के दिल रहता दुखी मेरा,
अब दिन और रात है...

जाने क्यूँ रूखे रूखे से आज मेरे ये जज़्बात हैं ?
के डर रहा हूँ अपनी ही महफ़िल में खुद का ही इस्तकबाल करने के लिए...

सुनता हूँ जब उनकी बातें,
सूनी हो जाती हैं मेरी रातें,

के डर रहा हूँ अपनी ही आँखों में इक तारे सा प्रकाश करने के लिए...

मेरी बस एक ख़ुशी, आज मेरे सारे दुखों का कारण है,
दिल हर दम है रो रहा, पर अश्कों में तो बस अब एक सूखा सावन है...

के तरस रहा है "माही",
आज इस सावन में खुद को तर करने के लिए...

माही !
चल अब कुछ करते हैं,
मर - मर के है बहुत जी लिया,
चल आज जीने के लिए मरते हैं...

के भेजा है खुदा ने तुझे भी इस जहाँ में,
कुछ न कुछ कर गुजरने के लिए...

- महेश बारमाटे "माही"
11th March 2011
12.35am 

रविवार, 6 मार्च 2011

कुछ पता ही न चला...

जाने कब तुम इस दिल में आ गए,
कुछ पता ही न चला...
जाने कब तुम मेरी यादों में छा गए,
कुछ पता ही न चला...

जाने कब तुम मेरे अरमानों में समां गए,
कुछ पता ही न चला...
जाने कब तुम मेरे सपनों में छा गए,
कुछ पता ही न चला...

जाने कब मेरी आँखों में तुम्हारी तस्वीर बन गई,
कुछ पता ही न चला...
जाने कब तुम मेरी तकदीर बन गई,
कुछ पता ही न चला...

जाने कब तुम मेरी बातों में आते चले गए,
कुछ पता ही न चला...
जाने कब तुम मेरी रग - रग में समाते चले गए,
कुछ पता ही न चला...

जाने क्यों मैं तुम्हारा इंतजार करने लगा,
कुछ पता ही न चला...
जाने कैसे मैं तुमसे प्यार करने लगा,
कुछ पता ही न चला...

जाने कैसे मेरा तुमसे इकरार हो गया,
कुछ पता ही न चला...
जाने कब मुझे तुमपे ऐतबार हो गया,
कुछ पता ही न चला...

पर जब मैंने ये जाना,
तब तक बहुत देर हो चुकी थी...
मैंने चाह था तुमको सब कुछ बताना,
पर मेरी किस्मत सो चुकी थी...

मैं तो तुम्हारा ही था, 
सदा के लिए,
और चाहा था तुम्हे भी अपना बनाना,
पर तब तक, 
तू मुझसे,
बहुत देर हो चुकी थी...
मैंने चाहा था,
तेरे लिए इक सपना सजाना,
पर तब तक तुम,
किसी और की आँखों का
नूर हो चुकी थी...

वो रात, वो तन्हाई का आलम,
जाने कब फिर मेरी जिंदगी बन गया,
कुछ पता ही न चला...
तू क्या गई,
मेरी सारी दुनिया, मेरा सारा जहाँ
मुझसे जाने कैसे रूठ गया 
कुछ पता ही न चला...

आज तड़प रहा है "माही",
के तेरी यादों का समुन्दर ख़त्म ही नहीं है होता...
और इंतज़ार में तेरे
ऐ माही !
ये दिल न जाने कब कब रोता है ?

ये भी मुझे कभी पता ही न चला...
सच में...
कुछ पता ही न चला...

महेश बारमाटे "माही"
6th March 2011
11:54pm 

 

सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

ऐतबार


आज अपनी ही परछाइयों से डरने लगा हूँ मैं...
के जब से तुझसे प्यार करने लगा हूँ मैं...

अन्जान है तू, आज भी मेरे हाल - ए - दिल से,
इस बात का गम नहीं मुझे,
बस अब तो तेरे एहसास से भी डरने लगा हूँ मैं...

घूम रहा था मैं इक दफ़ा,
आवारा परवाने की तरह...
के जब से देखा है तेरी शमा - ए - मुहब्बत,
बस एक ठंडी आग में जलने लगा हूँ मैं...

तुझे पा के भी हम, ऐ सनम !
तेरी दगा - ए - मुहब्बत से कभी तेरे हो न सके हम...
पर फिर भी आज तेरा इन्तज़ार करने लगा हूँ मैं...

मेरा मुकाम कहाँ तय था,
एक तेरा दिल ही तो मेरा आश्रय था...
टूट चूका हूँ इतना मैं, ओ मेरे माही !
के तेरी बेवफाई से भी आज वफ़ा करने लगा हूँ मैं...

ठुकरा दिया जिसने मुझे और मेरी मुहब्बत को,
आज उससे और भी प्यार करने लगा हूँ मैं...
के कभी तो तरस आएगा खुदा को मुझ गरीब पे, "माही"
किस्मत पे अपनी इतना तो ऐतबार करने लगा हूँ मैं....

- महेश बारमाटे
6th Nov. 2010