मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

वो... मेरा... अंतहीन एहसास है...

जाने क्या है वो ?
कभी लगता है बस एक आवाज है वो...
और कभी लगता है
के एक अजनबी एहसास है वो...

रोज ख्वाबों मे ही होती है बस उससे मुलाकात
और चुप चुप के होती है हर रात उससे फोन पे बात...

सोमवार, 23 जनवरी 2012

क्या लिखूँ ?

क्या लिखूँ ?

ज़िंदगी को लिखूँ दुःख की परिभाषा,
या कोई सुनहरा ख्वाब लिखूँ ?

हर पल रुलाता और सताता
ग़मों का पहाड़ लिखूँ...?
या हर पल मिलती 
खुशियों का संसार लिखूँ ?

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

हर रोज का राही...

रोज - रोज,
हजारों लोग,
मिलते हैं मुझको...
कुछ अनजाने से,
कुछ जाने पहचाने से चहरे,
दिखते हैं मुझको...

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

तेरा "माही" हूँ मैं... (maahi hoon main)

तेरी रातों का आलम हूँ मैं,
तेरी ज़िन्दगी के सातों जनम हूँ मैं...
मैं तो हूँ तेरी जुल्फों को सहलाती ठंडी हवा,
और तेरे बदन को भिगोता सावन हूँ मैं...

खुशबु तेरे बदन की,
मुझसे ही फ़ैल रही है फिज़ा में...
आजा ओ मेरी दिलरुबा !
छुपा लूं तुझे आगोश में अपनी...
के तेरा दिलबर, तेरा साजन हूँ मैं...

वो तेरे लबों की सुर्ख लाली,
वो तेरी जुल्फों की घटाएं काली - काली,
और वो तेरे मस्त नैनों की अदा मतवाली...
के मैं तो हूँ तेरा वक़्त और तेरा हमदम हूँ मैं...

वो तेरा शबाब-ए-हुस्न,
और तेरा महकता जिस्म,
मैं तो हूँ तेरी रग - रग में शामिल,
के तेरी मांग को सजाता कुमकुम हूँ मैं...

वो तेरा अदा से आँखें झुकाना,
और तेरा लातों को अपनी उँगलियों से खेलना और इतराना...
कभी तेरा शर्म से भी ज्यादा शर्माना...
तो कभी तेरी हया का दामन हूँ मैं...

वो तेरा बात - बात पे मुस्काना,
मुझसे बात करते वक़्त किसी की आहट से तेरा सहम जाना...
मैं तो हूँ तेरे लबों पे रूकती हर बात,
कभी उलफ़त-ए-शमा में मरता परवाना,
तो कभी जन्मों से तेरी उलफ़त में जीता तेरा "माही"...
तेरा जानम हूँ मैं...

- महेश बारमाटे "माही"

रविवार, 13 नवंबर 2011

एक चाहत थी...

एक चाहत थी,
तुमसे मिलने की...
गर पूरी हो पाती तो...

एक चाहत थी,
तेरे संग कुछ वक़्त साथ बिताने की...
गर पूरी हो पाती तो...

एक चाहत थी,
तेरे संग हंसने गाने की...
गर पूरी हो पाती तो...

एक चाहत थी,
तेरी हर ख़ुशी - ओ - गम में तेरा हर पल साथ निभाने की...
गर पूरी हो पाती तो...

एक चाहत थी,
बहुत कुछ समझने - समझाने की...
गर पूरी हो पाती तो...

और आज पूछ रही हो तुम,
के क्या चाहत है मेरी...
अब कैसे कहूँ तुमसे मैं... 
के मेरी तो बस चाहत थी यही... 

तेरे संग सातों जनम बिताने की...
बन के तेरा "माही"
तुझमें खो जाने की...

पर काश पूरी हो पाती तो... !

- महेश बारमाटे "माही" 

मंगलवार, 27 सितंबर 2011

वो एहसास...

पहले हम दोस्त बने,
और फिर
कुछ दिन बाद,
हमारी दोस्ती...
दोस्ती से भी बढ़ कर हो गई...

वो एहसास...
न तो दोस्ती थी
और न ही प्यार था...
वो जो कुछ भी था
शायद हमारी किस्मत को नागवार था...

के अब दरमियाँ हमारे,
न तो दोस्ती रही
और न ही प्यार...
और न ही रहा अब
दोस्ती से भी बढ़कर कुछ और...

रविवार, 18 सितंबर 2011

इक नई सरगम...

सुबह की पहली किरण का आगाज,
देखो ले के आया है एक नया दिन, एक नया आज।

वो देखो चली आ रही है ठंडी पुरवाई,
के लगता है जैसे इसने रात के संग होली हो मनाई।

पंछियों का ये सुरम्य संगीत,
पल भर में हर किसी को बना ले ये अपना मीत।

शनिवार, 10 सितंबर 2011

वो... मुझसे पूछा करती थी...

वो हर सुबह मुझसे 
मेरा ख्वाब पूछा करती थी...
कैसा था वो बीती रात का 
बादलों के पीछे छिपता महताब पूछा करती थी...।