शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

वो कुछ ख़ास है...

आज बहुत दिनों बाद मेरी कलम से कुछ शब्द दिल की आवाज को बयान करते मिले हैं... उम्मीद है आपको पसंद आएगी...। 

वो कुछ ख़ास है... 

वो दूर है,
और वो पास भी...
वो कुछ नहीं है,
पर वो ख़ास भी...

सोचता हूँ उसे,
और मानता हूँ उसे...
वो अगले कई जन्मों की तलाश है,
और वो एक प्यास भी... 

रोता हूँ उसके लिए,
और हँसता हूँ मैं संग उसके...
उससे इन्कार है मुझे
और उससे प्यार भी...

वो है मेरी ज़िंदगी का हर एक लम्हा,
फिर भी हूँ मैं अब तक तन्हा...
उसकी राहे-मंजिल हूँ मैं,
और वो मेरा साहिल भी...।

हूँ बेवफा मैं, बस उसके लिए...
और निभाई है वफा, शायद बस खुद के लिए...
 तू मेरी जीत का आगाज है माही !
और दिल की हार का साज भी...

तू दूर है...
और पास भी...
तू कुछ नहीं....
पर ख़ास भी...

- महेश बारमाटे "माही"
28 सितंबर 2012

सोमवार, 16 अप्रैल 2012

कभी कभी लगता है...



कभी कभी लगता है,
तुमको,
बस तुमको सुनता रहूँ...
कभी कभी लगता है,
तुमसे दिल की सारी बात कह दूँ...

रविवार, 18 मार्च 2012

दोस्ती और प्यार...


ऐ साजन मेरे !
जब तुम होते हो साथ मेरे...  
भूल जाता हूँ मैं सारा जहां,
हर शख्स, हर रिश्ता और हर दोस्त मेरा...
पर माफ कर देना तुम मुझे
के जब दोस्त हो कोई साथ मेरे
मैं तुझे कभी भूलता नहीं
पर उनका साथ आने देता नहीं
कभी तेरी याद
के दोस्ती और प्यार
होते हैं जैसे
इक़रार और एतबार...

शनिवार, 3 मार्च 2012

इंतज़ार...

इंतज़ार...

कभी - कभी कितना सुखद होता है
और कभी क्यों ये होता है दुःखद ...?

गर इश्क़ हो किसी से,
तो ये कीचड़ में खिलते कंवल सा होता है...
और कभी ये होता है केवल एक गहरा दलदल
गर हो ये कोई बस एक ज़रूरत...

कभी किसी के इंतज़ार में
हम बिता देते हैं कई सदियाँ
तो कभी कटता ही नहीं
एक और पल...

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

वो... मेरा... अंतहीन एहसास है...

जाने क्या है वो ?
कभी लगता है बस एक आवाज है वो...
और कभी लगता है
के एक अजनबी एहसास है वो...

रोज ख्वाबों मे ही होती है बस उससे मुलाकात
और चुप चुप के होती है हर रात उससे फोन पे बात...

सोमवार, 23 जनवरी 2012

क्या लिखूँ ?

क्या लिखूँ ?

ज़िंदगी को लिखूँ दुःख की परिभाषा,
या कोई सुनहरा ख्वाब लिखूँ ?

हर पल रुलाता और सताता
ग़मों का पहाड़ लिखूँ...?
या हर पल मिलती 
खुशियों का संसार लिखूँ ?

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

हर रोज का राही...

रोज - रोज,
हजारों लोग,
मिलते हैं मुझको...
कुछ अनजाने से,
कुछ जाने पहचाने से चहरे,
दिखते हैं मुझको...

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

तेरा "माही" हूँ मैं... (maahi hoon main)

तेरी रातों का आलम हूँ मैं,
तेरी ज़िन्दगी के सातों जनम हूँ मैं...
मैं तो हूँ तेरी जुल्फों को सहलाती ठंडी हवा,
और तेरे बदन को भिगोता सावन हूँ मैं...

खुशबु तेरे बदन की,
मुझसे ही फ़ैल रही है फिज़ा में...
आजा ओ मेरी दिलरुबा !
छुपा लूं तुझे आगोश में अपनी...
के तेरा दिलबर, तेरा साजन हूँ मैं...

वो तेरे लबों की सुर्ख लाली,
वो तेरी जुल्फों की घटाएं काली - काली,
और वो तेरे मस्त नैनों की अदा मतवाली...
के मैं तो हूँ तेरा वक़्त और तेरा हमदम हूँ मैं...

वो तेरा शबाब-ए-हुस्न,
और तेरा महकता जिस्म,
मैं तो हूँ तेरी रग - रग में शामिल,
के तेरी मांग को सजाता कुमकुम हूँ मैं...

वो तेरा अदा से आँखें झुकाना,
और तेरा लातों को अपनी उँगलियों से खेलना और इतराना...
कभी तेरा शर्म से भी ज्यादा शर्माना...
तो कभी तेरी हया का दामन हूँ मैं...

वो तेरा बात - बात पे मुस्काना,
मुझसे बात करते वक़्त किसी की आहट से तेरा सहम जाना...
मैं तो हूँ तेरे लबों पे रूकती हर बात,
कभी उलफ़त-ए-शमा में मरता परवाना,
तो कभी जन्मों से तेरी उलफ़त में जीता तेरा "माही"...
तेरा जानम हूँ मैं...

- महेश बारमाटे "माही"