सोमवार, 3 जनवरी 2011

तमन्ना थी...

तमन्ना थी के हम फिर मिलें,
तमन्ना थी के कुछ पल हम फिर साथ चलें...

तमन्ना थी के तेरी ज़ुल्फों की छाँव में, एक लम्हा गुज़ार दूँ...
और उस एक लम्हे में तुझे, खुद से भी ज्यादा प्यार दूँ...

तमन्ना थी के तेरी हर एक अदा को, अपनी कविताओं में भर दूँ...
गर तू कहे तो तेरी माँग में, चाँद - तारों से भर दूँ...

तमन्ना थी के तेरी हँसी ही मेरी, सुबहो - शाम हो,
और तेरी पलकों की छाँव में अपनी महफिले - आम हो...

तमन्ना थी के हर रात मैं तेरे स्वप्नलोक का राही बनूँ...
ज़िन्दगी के हर मोड़ पे मैं ही तेरा हमसाया और मैं ही तेरा माही बनूँ...

तमन्ना थी के मेरी हर ख्वाहिश की तुमसे ही शुरुआत हो...
जहाँ भी देखूँ तो बस, मेरी तुमसे ही मुलाकात हो...

तमन्ना थी के तेरी खूबसूरती मेरी हर ग़ज़ल में शामिल हो,
और मेरी हर नज़्म बस तुझे ख़ुशी देने के काबिल हो...

तमन्ना थी के तेरा - मेरा प्यार हो इतना पवित्र,
के वो इस जहाने - इश्क के लिए ताज महल से कम न हो...
गर मिले कभी कोई गम मुझको,
लेकिन तेरी आँखें नम न हो...

तमन्ना थी के तेरी आँखों में डूब कर,
         एक नया ज़हाँ बसाना था...
समुन्दरे - इश्क की गहराई से तेरे लिए,
         कोई अनमोल मोती मुझे लाना था...

पर किस्मत को शायद, 
            कुछ और ही मंज़ूर था,
जिसको समझा मैंने दिल के सबसे करीब,
            वो ही दिल - ही - दिल में मुझसे दूर था...

जाने क्यों बहुत करीब थे तब हम,
         जब दरमियाँ हमारे बहुत दूरी थी...
वो दिन भी बड़े खुश - गवार थे,
         और हमारी न ही कोई मजबूरी थी...

आज मैं बस तेरी ही एक तमन्ना के लिए,
    अपनी हर ख़ुशी लुटा बैठा हूँ...
और तेरे प्यार को भी अपने दिल से,
           मिटा बैठा हूँ मैं...

अपनी तमन्नाओं का सागर,
          इस कदर पी लिया है आज मैंने,
के ऐसा लग रहा है जैसे तेरी याद में,
           एक युग जी लिया है आज मैंने...

पर आज इस सागर में फिर,
                एक लहर बहुत ऊँची उठी है,
पर जल्द ही टूट गयी वो प्यासी लहर,
                जब याद आया के तू अब भी मुझसे रूठी है...

तमन्ना थी के  आज तुझे अपनी आप बीती सुनाऊँ,
और अपनी तमन्नाओं में आखिरी बार डूब जाऊँ...
           डूब जाऊँ...
           कहीं खो जाऊँ.... और
                          कभी वापस ना आऊँ...

"रो रहा है हर पल, मेरी तमन्नाओं का ये सागर...
सूखने का इसे डर नहीं, बस तेरे रूठ जाने का गम है...
आ के तू एक बार तो देख इसे, ऐ मेरी तमन्ना !
वो दरिया जो कभी बहा था, इन आँखों से,
ज़मीं आज भी उसकी नम है..."

माही (महेश बारमाटे)
27th Feb 2010

रविवार, 2 जनवरी 2011

महेश हूँ मैं...

 
कुछ ख़ास नहीं, कोई खूबी मेरे पास नहीं,
फिर भी खुद में ही विशेष हूँ मैं ,
हाँ,
          वही सीधा - साधा इंसान
                   महेश हूँ मैं...

मुझमे है बस यही एक खूबी...
के मेरी दुनिया तो है बस "कहानी - कविताओं" में डूबी...

आज लोगों ने बस इन्ही की बदौलत मुझको है जाना,
         पर न मिला मुझको कोई भी ऐसा,
                  जिसने मुझको हो थोड़ा भी पहचाना...

अपनी ही दुनिया में खुश रहता हूँ मैं,
अक्सर महफ़िलों में ही चुप रहता हूँ मैं...

इसी कारण आज लोगों की नज़रों से दूर हूँ मैं,
और बेवजह ही किसी के प्यार के इल्ज़ाम में मशहूर हूँ मैं...

लोगों ने अक्सर मुझे, 
           रास्ते का है वो पत्थर समझा,
                      के गर मन किया तो संग बैठ के,
                                         थोड़ा आराम कर लिया,
और नहीं तो मुझको, या तो अनदेखा किया, 
                                          या उठा के फेंक दिया...

लोग सोचते हैं की मुझको कभी दर्द नहीं होता,
मेरी जिंदगी का कोई भी मौसम, कभी गर्म - सर्द नहीं होता...

पर कैसे बतलाऊं मैं सबको, के इस दिल को भी लगती ठेस है,
             और ये सब आपको बतलाने वाला, 
                    और कोई दूसरा नहीं, 
                      केवल "महेश" है...

बस अपनी इन्ही खूबियों के कारण,
        दुनिया की अदालत का बहुत विचित्र case हूँ मैं...
लोगों ने गर समझो तो विशेष,
         वरना वही पुराना "महेश" हूँ मैं...

सच कहूँ...

जीता था मैं कभी खुद के लिए,
पर आज जीता हूँ, बस एक ज़िद के लिए...

के मरने से पहले,
     एक ऐसा काम मैं कर जाऊं,
जिंदगी की एक शाम...
    अपने चाहने वालों के नाम कर जाऊं...

पर उस शाम से पहले मेरे पास, 
                          अभी काफी समय शेष है...
उस शाम से पहले करूँ मैं कोई काम ऐसा,
                     के लोग दूर से ही देख के बोलें, 
अरे ! 
       यही तो अपना 
                       "महेश" है...

- माही (महेश बारमाटे)
15th March 2009

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

इल्तिजा


न दे जवाब ऐ दिल मेरे,
शायद तूने भी धड़कना बंद कर दिया...

मर गया इन्सां आज इसीलिए तो अब...
शरीर ने भी अब फड़कना बंद कर दिया... 

कैसा था वो रहमो - करम उस खुदा का,
के उसके बन्दों ने भी अब सदके पे उसकी झुकना बंद कर दिया...
खो गई हैं राहे - इबादत,
के लोगों ने अब बहकना बंद कर दिया...

फ़ैलने लगा है राज शैतान का इस कदर,
के खुदा ने भी शायद इस तरफ देखना बंद कर दिया...

फिर भी कायम है किसी दिल में खुदा की सल्तनत,
के शैतान ने भी खुदा से अब लड़ना बंद कर दिया...

सो गया है ज़मीर आज इंसान का,
के उसने भी अब अच्छे काम करना बंद कर दिया...

करीब है अब वक्त - ए - क़यामत,
के घड़ी ने भी अब चलना बंद कर दिया...

खुश हूँ मैं के मिलूँगा अब अपने खुदा से,
के मैंने भी क़यामत की चाह में अब दिन गिनना बंद कर दिया...

अंजाम जो भी मिले खुदा के दर पे,
के मैंने तो जन्नत और दोजख़ को भी अपनी मंज़िल में गिनना बंद कर दिया...

तू भी अब माँग ले माफ़ी, खुदा से ऐ मेरे "माही" !
के पछताएगा गर उसने भी माफ़ करना बंद कर दिया...

महेश बारमाटे "माही"
20th Aug. 2010

शनिवार, 18 दिसंबर 2010

वो चाँद सा मुखड़ा...



वो प्यारा सा मुखड़ा, 
जैसे चाँद का टुकड़ा...

आँखों में नींदें भरा,
अपने "Bag" को सिरहाना बना...

सो रही है वो, यूँ नींद की आगोश में, 
जैसे डूबी हो वो, किसी गहरी सोच में...

शायद कोई सपना, उसकी आँखों में पल रहा होगा,
या आने वाला कल, उसके दिलो - दिमाग में चल रहा होगा...

जाने किस सोच में डूबी होंगी आँखे उसकी,
या किसी अपने को सुनने के लिए तड़पती होंगी बातें उसकी...?

नींद में भी आँखे उसकी हैं शायद कुछ कह रहीं,
के आज वो मेरे मन मष्तिस्क को, इक स्वप्न परी सी है लग रही...

उसकी इस अदा ने मुझपे, जाने कैसा जादू ढाया है,
के देख के उसका चंचल मुखड़ा, आज मुझे कोई अपना याद आया है...

रुखसारों को चूमती उसकी जुल्फें,
चुरा रही हैं दिल मेरा चुपके - चुपके...

हाय ! कैसे सम्भालूँ अब अपने इस पागल दिल को,
के लगता है जैसे पा लिया हो, आज इस राही ने भी अपनी मंज़िल को...

नींद में उसका यूँ मुस्कुराना,
जैसे सुहाग की सेज पर, दुल्हन का शर्माना...

ज़ालिम हर अदा ने उसकी, ऐसा ज़ुल्म मुझपे ढाया है,
के आज एक मेनका ने फिर, किसी विश्वामित्र का दिल पिघलाया है...

ये दुआ कर रहे थे हम,
के दिल की बातों को अब ले वो सुन...

और देखो दुआ मेरी अब पूरी होती नज़र आई है,
पलकों ने उसकी देखो ली अभी - अभी अंगड़ाई है...

आह ! मेरी सोच से भी परे,
नयन हैं उसके नीले नीले...

नीले नयनो की कमान से, उसने ऐसा बाण चलाया है,
 के एक ही वार में उसने, ये तीर - ए - नज़र सीधा दिल के आर - पार पहुँचाया है...

वो कर के घायल हमको, फिर खो गयी नींद की आगोश में,
और दिल देकर भी, अब हम न रहे होश में...

नींद में उसका यूँ मुस्काना,
लगता है जैसे अपनी जीत पर उसका इतराना...
खुदा कसम, मार डालेगा अब मुझे, 
उसका यूँ चहरे से अपनी जुल्फें हटाना...

वो तो सो गई, बस एक प्यारी सी मुस्कान देकर,
अब जाने कैसे कटेगा ये सफ़र मेरा, दिलो - जाँ खोकर...

अब तो खुदा से बस यही दुआ करता है दिल मेरा, "माही"...
के लूटा है जिसने चैनो - करार इस दिल का,
बस वही बने अब मेरी जिंदगी के सफ़र का हमराही...

महेश बारमाटे "माही"
12th Dec. 2010

गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

वादा


तन्हा ही आए थे, तन्हा ही जायेंगे,
इक मुलाकात का किया था जो वादा हमने,
मरने से पहले वो हर वादा निभा जायेंगे...

तुम इंतज़ार न करना हमारा,
हम मिलने जरूर आयेंगे...
देखे थे ख्वाब हमारी मुलाकात के जो तुमने,
हर वो ख्वाब हम पूरा करते जायेंगे...

रुक जायेगा वक्त, जब हम तुमसे मिलने आएँगे,
अपनी जुदाई के सारे मंज़र,
मेरे वादे के सामने थमते जायेंगे...

तब न रोक पाएगा कोई रकीब भी हमको,
जब हम तेरा दीदार करने आएँगे...

बस मेरी बात पर ऐतबार रखना "माही",
के तुझको रुसवा न किया है कभी हमने,
और न कभी हम ऐसा कर पाएंगे...

By
महेश बारमाटे - "माही"
18th Nov. 2010

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

ऐतबार


अपनी ही परछाइयों से डरने लगा हूँ मैं...
के जब से तुझसे प्यार करने लगा हूँ मैं...

अन्जान है तू आज भी मेरे हाले - दिल से...
इस बात का कोई गम नहीं मुझे,
बस अब तो तेरे एहसास से भी डरने लगा हूँ मैं...

घूम रहा था मैं इक दफा,
आवारा परवाने की तरह...
के जब से देखा है तेरी शमा - ए - मुहब्बत,
बस इक ठंडी आग में जलने लगा हूँ मैं...

तुझे पा के भी, ऐ सनम !
तेरी दगा - ए - मुहब्बत  से कभी तेरे हो न सके हम...
पर फिर भी आज तेरा ही इंतज़ार करने लगा हूँ मैं...

मेरा मुकाम कहाँ तय था,
एक तेरा दिल ही तो बस मेरा आश्रय था...
टूट चूका हूँ आज इतना मैं, ओ मेरे माही !
के तेरी बेवफाई से भी वफ़ा करने लगा हूँ मैं...

ठुकरा दिया जिसने मुझे और मेरी मुहब्बत को,
आज उससे और भी प्यार करने लगा हूँ मैं...
के कभी तो तरस आएगा खुदा को भी मुझ पे "माही",
किस्मत पे अपनी, इतना तो ऐतबार करने लगा हूँ मैं...

महेश बारमाटे "माही"
6th Nov. 2010

शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010

सबक... प्यार का..

सबक... प्यार का..


किसी को सुकून मिलता है,
किसी का गम उजागर होता है...
ज़िन्दगी के इन तन्हा रास्तों में जब कोई पराया,
प्यार का सागर बन के उतरता है...


एक पल में ही वो पराया, अपनों से भी प्यारा हो जाता है...
क्या कोई बताएगा मुझे, के इस सागर में इतना प्यार कहाँ से आता है ?


इस प्यार के सागर में हम, दुनिया भूल जाते हैं...
जीना क्या, हम तो मरना भी भूल जाते हैं...
अपने परायों को तो छोड़ो, जिसने हमें किया पैदा,
हम तो उन्हें तक याद करना भूल जाते हैं...


चार दिनों दा प्यार हमारा, बीस सालों के प्यार पर भारी पड़ जाता है...
वो इकलौता मेरा सनम, मेरे लिए तो दुनिया सारी बन जाता है...


कुछ ऐसा ही हुआ साथ मेरे भी, जब हुआ मुझे भी किसी से प्यार...
प्यार में उसके हो गई मैं बावरी, और छोड़ा घर - बार...


मेरा सनम, मेरा माही, मेरी सारी ज़िन्दगी का हमराही...
आज भूल गई प्यार में उसके, के क्या था गलत और क्या है सही...


साथ मिला जो उसका, तो मैं भी बागी हो गई...
भाग कर संग उसके, आज दुनिया कि नज़रों में मैं भी दागी हो गई...


कर दिया इक बार जो खुद को उसके हवाले,
फिर न सम्भला दिल, लाख सम्भाले...


हो गई मैं उसके प्यार की दासी,
पर आज क्यों छाई, ज़िन्दगी में मेरे ये उदासी...?


अपनों ने नाता तोड़ा, गैरों ने भी पूछा नहीं...
आज वो भी छोड़ के मुझे चला गया, प्यार में जिसके मुझे कुछ सूझा नहीं...


जोगन हो के तेरे प्यार में, आज दर - दर भटक हूँ रही...
हे भगवान ! क्या हो गया था मुझको, क्यों सच मुझको दिखा ही नहीं ?


आज मेरे प्यार कि निशानी, कोख में है मेरे,
पर अपना नाम देने इसे, आज कोई तैयार नहीं...
क्यों किया उसने मेरे साथ ऐसा,
जब था उसको कभी मुझसे प्यार नहीं ?


मेरी ज़िन्दगी तबाह करके,
आज खुश है वो एक और नया विवाह करके...
कर रहा है उसके साथ भी शायद वही,
जो छोड़ दिया उसने मुझे ना जाने कितनी मर्तबा करके...


दिल कोस रहा है उसको, आज लाखों बार...
फिर भी इस दिल के किसी कोने में,
आज भी है उसके लिए प्यार...


क्योंकि मैंने तो दिल से चाहा था उसको,
सारी दुनिया में उसके सिवा, और कोई ना भाया था मुझको...


मैं तो जी गई तेरे प्यार में,
अब तो जी रही हूँ बस इस इंतज़ार में...


के मरने से पहले तुझे भी तड़पता देखना हूँ चाहती...
तू चाहे ना चाहे, पर तुझ संग ही मैं मरना हूँ चाहती...


मेरी सज़ा का तू हक़दार है "माही"...
के तू ही मेरा पहला और आखिरी प्यार है "माही"...


सज़ा भी ऐसी के तुझे हर पल याद रहे...
के हर जन्म में अब, बस तेरा - मेरा साथ रहे...


आज तुझे मैं अपने प्यार का एहसास दिलाना चाहती हूँ...
जो कभी मुझे थी, मैं तुझे भी वो प्यास दिलाना चाहती हूँ...
किया है सच्चा प्यार मैंने तुझसे,
ये सारी दुनिया को विश्वास दिलाना चाहती हूँ...


और चाहती हूँ के दुनिया भी जाने,
के प्यार में धोखा क्या होता है ?
इस प्यार के सागर की गहराई में इन्साँ,
कभी हँसता ही नहीं, बल्कि हमेशा ही रोता है...


न करना ऐसा प्यार ऐ नौजवानों !
गर अपने सपनों को अंत तक साकार करने की ताकत न हो तुम में...
खुदा करे कि मुझ जैसी गलती,
अब की बार करने की हिमाकत न हो तुम में...


टूट जाते हैं घरौंदे, इक छोटी सी गलती से...
बिखर जाता है हर एक तिनका, बस एक नासमझी से...


फिर नहीं मिलता कोई भी आशियाना, सर छुपाने के लिए...
गर प्यार करना है तो बस इतना जान लो,
के प्यार में सीखो सिर्फ खोना,
ये किया जाता नहीं, कभी कुछ पाने के लिए...


                       - Mahesh Barmate (माही)
                          21st Apr. 2010

बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

क्यों ?

क्यों ?

किसने था कभी चाहा मुझको,
अतीत में मेरे कोई नहीं जिसने कभी था सराहा मुझको...
डूब रहा था चुपचाप ही अपनी ही तन्हाइयों में,
आखिर क्यों आज तुमने बचाया मुझको ?

                     मेरी ज़िन्दगी का नासूर,
                     जब खुशियाँ देने लगा था मुझको,
                     खुश था शायद बहुत मैं अपने हाल से,
                     फिर क्यों दर्द-ए-दिल तमने दिया मुझको ?

मैं तो भूल चूका था चाहत का हर रास्ता शायद,
फिर तेरा प्यार क्यों इसी रास्ते पर फिर ले आया मुझको?

                    गर लुट चूका था हर राही तेरी मन्जिल का,
                     तो फिर क्यों तुमने अपना माही बनाया मुझको ?

                                                                                     महेश बारमाटेमाही 
                                                                                         5th Oct 2010