शुक्रवार, 27 अप्रैल 2018

बीती रात..



रौशनी तो कम हो गई थी
पर आँखों के चराग
अब भी जल रहे थे
हम बीती रात
दिल मे लिए कई ख्वाब
अनजानी राहों में चल रहे थे।

इक आहट हुई
और ख्वाबों का मेहताब टूट गया
कुछ टुकड़े चुभे दिल की ज़मीं पे
कोई अरमां आँखों से रिसता हुआ रुठ गया।

अँधेरों में सोने की आदत नहीं थी
उजालों ने डरना सिखा दिया
वक़्त-ए-सफ़र भी क्या खूब गुजरा माही!
के फैसले की घड़ी में उसने तुझे मेरा दीवाना बना दिया..

महेश बारमाटे "माही"
27 apr 18

4 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, कश्मीर किसका !? “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' ३० अप्रैल २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आमंत्रण में आपको 'लोकतंत्र' संवाद मंच की ओर से शुभकामनाएं और टिप्पणी दोनों समाहित हैं। अतः आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

    टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

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