दिल तोड़ कर मेरा, कहते हो -
कहीं... दर्द तो नहीं हुआ ?
मेरे ज़ख्मों पर छिड़क कर नमक, कहते हो -
कहीं... दर्द तो नहीं हुआ ?
इश्क को मेरे मार कर ठोकर, कहते हो -
कहीं... दर्द तो नहीं हुआ ?
जिम्मेदार मेरी इस हालत का बनकर, कहते हो -
कहीं... दर्द तो नहीं हुआ ?
मेरे दिल के टुकड़ों पर रख कर कदम, कहते हो -
कहीं... दर्द तो नहीं हुआ ?
अब तुम्हे क्या कहूँ मैं,
के इस दर्द में भी एक अलग मज़ा है...
मिले ख़ुशी तुम्हे और गम मुझे,
शायद मेरे खुदा की यही रज़ा है...
फिर भी अगर, मिले कभी खुदा तो,
पूछूँगा मैं उनसे,
के
देखकर मेरी ऐसी हालत,
कहीं... दर्द तो नहीं हुआ ?