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शनिवार, 1 अगस्त 2020

वो, महफ़िल और इश्क़

मैंने कुछ कहानियाँ गढ़ीं
कुछ किस्से कहे
वो शामिल थे मुझमें
वो सुनते रहे।

वो दूर बैठे थे महफ़िल में
तमाशबीन बन कर
सीने से लगने को जी किया
अश्क़ बहते रहे।

महफ़िल में हर शख्स ने 
तारीफ में उनकी वाहवाही लुटाई
इशारों - इशारों में नज़रें फिरा कर हम भी
बस उनके चेहरे को ही देखते रहे।

चारों तरफ खामोशियाँ सी फैल गईं
जब लबों पे नाम तेरा आया माही!
तुमने इज़हार-ए-ज़ुल्म-ए-मुहब्बत कर लिया
तुम जो महफ़िल को छोड़ गए।

- महेश "माही"

रविवार, 5 अक्टूबर 2014

आज जरा जी लेने दे मुझे...


आ भर लूँ बांहों में तुझे
कि आज जी लेने दे मुझे।

ये तरसती निगाहें
और खुली मेरी बाहें
तू इन धड़कनों की प्यास है
क्या कहती हैं धड़कने तेरी
आज सुनने दे मुझे।

मेरी प्यास है तू
एक अन्जाना एहसास है तू
लिखा है नाम मेरा
हाथों की लकीरों में तेरी
एक बार फिर पढ़ने दे मुझे।

ये लबों की सुर्खी मेरी
बस तेरे नाम से है माही!
है इश्क़ तुझसे
कि आज लबों को लबों से
छू लेने दे मुझे।

आज जरा जी लेने दे मुझे...।

-महेश बारमाटे "माही"

रविवार, 1 जून 2014

ज़िंदगी के मायने...

ज़िंदगी के मायने 
ज़िंदगी भर ढूंढते रहेंगे
अगर तुझे खो दिया
तो जाने कहाँ ढूंढते रहेंगे।

अब दीदार की तमन्ना है
इक मुलाकात की तमन्ना है।
तू अगर किसी और का हो गया
तो खुद को हम कोसते रहेंगे।

तुझे पाने की ख़्वाहिश नहीं
अपना बनाने की ख्वाहिश नहीं,
बस तुझमे समाना है,
अगर बिखर गया तो
फिर खुद को कहाँ खोजते रहेंगे।

एक बार आ
मुझ में समा जा
बसा के मन मंदिर में माही!
तुझे हर वक़्त
पूजते रहेंगे।

- महेश बारमाटे "माही"

गुरुवार, 15 मई 2014

किसके लिए ?


दिल करता है आज जरा रो लूँ
पर किसके लिए ?
ज़िंदगी भर के पाप आज
अश्कों की बारिश में धो लूँ
पर किसके लिए ?

मेरा दर्द – ओ – दवा बस तू है,
अब कुछ महसूस करूँ भी तो किसके लिए ?

तू जानता है मेरे हर मर्ज की दवा
आज मैं बीमार पड़ूँ भी तो किसके लिए ?

इश्क़ – ओ – ग़म आज दोनों हैं मुझे तुझसे
इज़हार करूँ भी तो किसके लिए ?

मेरा दिल, मेरी जां
सब तेरे नाम कर दिया है माही!
आज तुझे मैं प्यार करूँ भी तो
किसके लिए ???

- महेश बारमाटे "माही"

सोमवार, 5 मई 2014

मैं...

तेरे इश्क़ की
आवाजें सुनता मैं। 
अब हर पल
तेरी धड़कनों से
बातें करता मैं ।

कभी इस जहां, कभी उस जहां
कभी दरिया तो कभी सहरा
बस तुझे ही ढूँढता फिरता मैं।

जी रहा हूँ इस कदर
दर-ब-दर, दर-ब-दर
हर गली हर शहर
तेरे ही नगमें गाता मैं।

ज़िंदगी एक ख्वाब हो
या सफर...
जुदा हो के भी
बस तुझमे समाता मैं।

तेरी कहानी
का हर लफ्ज
मेरी आँखों से पढ़ ले
के हर किस्से में
खुद में ही खोता जाता मैं।

आज मुझमे और तुझमे
क्या फर्क है बचा माही!
कभी तू मुझमे
कभी तुझमे समाता मैं।


- महेश बारमाटे "माही"

बुधवार, 30 अप्रैल 2014

वो मुझसे प्यार करने लगे हैं...

वो मेरा इंतज़ार करने लगे हैं
कुछ – कुछ मुझसे इक़रार करने लगे हैं
यूं तो कभी न हुई कोई मुलाक़ात हमारी
पर अब वो ख्वाबों में मेरा दीदार करने लगे हैं।

बस जानते हैं
एक – दूजे को हम,
पर पूरी तरह से नहीं।
फिर भी मेरी अनजान शख्सियत पे
वो अब एतबार करने लगे हैं

मेरी पसंद – न – पसंद तो
रब जानता है मेरा।
पर अपनी पसंद का वो अब
सरे – आम इज़हार करने लगे हैं।

हर पल बदलती अदा ये उनकी
मेरी सोच मे दस्तक देती है
के अब क्या कहूँ इसे मैं माही!
क्या वो मुझसे प्यार...
करने लगे हैं ???

- महेश बारमाटे "माही"

बुधवार, 29 जनवरी 2014

इश्क़

तुम तो गाड़ी से आ रहे थे,
और हम पैदल ही जा रहे थे...

जानूँ न क्यों तुमने,
हमको था फिर यूँ ठोका
के अब तो हमे भी दिन में 
तारे नज़र आ रहे थे। 

सामने की गाड़ी ने भी 
ब्रेक से था खुद को रोका 
पर वो तो था दिमाग से पागल,
ब्रेक की जगह वो तो,
एक्सिलीरेटर दबा रहे थे...

हमारी तो गलती थी इतनी,
के हम तो रोड किनारे से जा रहे थे,
और पीछे की गाड़ी में साहब,
मेमसाब से इश्क़ फ़रमा रहे थे। 

अब तो टूटी थी हड्डी
और हम दर्द से कराह रहे थे
और देखने वाले भी हमको 
मंद - मंद मुस्कुरा रहे थे। 

सायरन सुना जब एंबुलेंस का
तो लगा कि अब तो बच ही गए,
पर क्या पता था के अब तो  
यमदूत भी सायरन वाले वाहन में आ रहे थे... 

मरते - मरते हम तो 
जाने क्या - क्या गुनगुना रहे थे
के "मर जाओ तुम कमीनों 
जो रात का मज़ा,
दिन - दहाड़े गाड़ी में लिए जा रहे थे... "


- इंजी॰ महेश बारमाटे "माही"