सोमवार, 25 दिसंबर 2017

मेरी दुल्हन

रूठने लगती है रूह मेरी मुझसे 
जब जब तेरे चेहरे पे शिकन देखता हूँ ।

के अश्क़ो  को तो तुम छुपा जाते हो अक्सर 
पर मैं तो आँखों में तेरे दर्द का समंदर देखता हूँ।

तू लाख छुपा ले दर्द अपने 
पर तुझको अक्सर मैं अपने अंदर देखता हूँ। 

तेरी कहानी का सरताज नहीं मैं 
पर ये जान ले, के तुझमें ही मैं अपनी जान देखता हूँ। 

खुद को मजबूर सा समझने लगता हूँ अक्सर 
के जब - जब अश्क़ो से भीगा तेरा आँचल देखता हूँ। 

चल पड़ा हूँ 'माही' तेरी राहे  - उल्फत में अब तो 
के तुझमें ही मैं अपनी दुल्हन देखता हूँ। 

-महेश "माही"
25 /12 /17 
12 :43 pm 

1 टिप्पणी:

  1. दुल्हन तो एक रिश्ते का नाम है ...
    रिश्ता बन जाये दिल से ये जरूरी है ...

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